papmochani ekadashi vrat katha: मार्च महीने में दो एकादशी हैं. इनमें पहली पापमोचनी एकादशी और दूसरी कामदा एकादशी है. हिंदू पंचांग के अनुसार, 14 मार्च की सुबह 8 बजकर 10 मिनट से चैत्र कृष्ण एकादशी तिथि शुरू होगी. इसके बाद यह 15 मार्च की सुबह 9 बजकर 16 मिनट तक रहेगी. ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक, इस बार पापमोचनी एकादशी का व्रत रविवार (15 मार्च, 2026) के दिन रखा जाएगा. मान्यता है कि एकादशी भगवान विष्णु की पूजा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. यहां पर यह भी जान लें कि चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी कहा जाता है. एकादशी के व्रत पर पूजा-पाठ के साथ कथा सुनना या पढ़ना अनिवार्य है. इसके बिना व्रत अधूरा है. यहां पर हम बता रहे हैं कि पापमोचनी एकादशी की व्रत कथा के बारे में.
मेधावी ऋषि-अप्सरा मंजुघोषा से जुड़ी है कहानी
पुराणों के अनुसार, पापमोचनी एकादशी की कथा भगवान कृष्ण ने अर्जुन को एक बार सुनाई थी. इसका प्रसंग तपस्वी मेधावी ऋषि से जुड़ा है. एक सुंदर वन था, जिसका नाम चैत्ररथ था. इसकी खूबी थी कि यहां हमेशा वसंत ऋतु रहती थी और हर तरह के फूल खिले रहते थे. इसी वन में मेधावी ऋषि तपस्या किया करते थे. गंधर्वों के राजा चित्ररथ एक दिन अपनी अप्सराओं के साथ सुंदर वन में पधारे. इनमें एक अप्सरा मंजुघोषा भी थी, जिसकी दृष्टि मेधावी ऋषि पर गई. मंजुघोषा ऋषि को आकर्षित करने के इरादे से कुछ ही दूरी पर बैठकर वीणा बजाने लगी. इसके साथ ही गीत भी गाने लगी. मंजुघोषा का साथ कामदेव ने भी दिया. मंजुघोषा को कामयाबी भी मिली और ऋषि मेधावी का मन विचलित हो गया. फिर क्या था मधावी ऋषि अप्सरा मंजुघोषा पर मोहित होकर उसके साथ रहने लगे. इसका उन्हें लंबे समय तक एहसास भी नहीं हुआ.
अप्सरा संग 57 वर्ष तक खोए रहे ऋषि
एक दिन मेधावी ऋषि से मंजुघोषा ने स्वर्ग लौटने की अनुमति मांगी. तब जाकर उन्हें एहसास हुआ कि 57 वर्ष बीत चुके हैं. उन्हें गलती का एहसास हुा तो गुस्साए मेधावी ऋषि ने मंजुघोषा को श्राप दे दिया कि वह पिशाचिनी बन जाएगी. इस पर परेशान और दुखी मंजुघोषा विनती की कि उसे इस श्राप से मुक्त होने का कोई उपाय बताएं. इस पर ऋषि मेधावी ने उपाय के बारे में जानकारी दी. उन्होंने कहा कि यदि वह चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत रखेगी तो उसे इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी.
व्रत ने दिलाई दोनों को मुक्ति
बात यही समाप्त नहीं हुआ. ऋषि मेधावी भी अपने पिता च्यवन ऋषि के पास गए. उन्होंने सारी बात बताई और फिर अपने पाप का प्रायश्चित पूछा. पिता ने मेधावी ऋषि को भी पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी. इसके बाद मेधावी ऋषि और अप्सरा मंजुघोषा ने श्रद्धा और नियम के साथ इस एकादशी का व्रत किया. मान्यता है कि अप्सरा मंजुघोषा को पिशाचिनी योनि से मुक्ति मिल गई. इसके बाद वह अपने सुंदर रूप में स्वर्ग चली गई. इसी तरह ऋषि मेधावी के पाप भी नष्ट हो गए. हिंदू धर्म में मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से यह व्रत करता है और इसकी कथा सुनता है, उसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के कष्ट दूर होने लगते हैं. इसके साथ ही परिवार में भी शांति आती है.

