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भारत की इस खौफनाक जगह से हुई थी कलियुग की शुरुआत, दुनियाभर में मच गया था कोहराम! कांप गया था मंजर देखने वाला हर एक शख्स

Mahabharat Kila Parikshitgarh: उत्तर प्रदेश में महाभारत काल की धरती मेरठ अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए जानी जाती है। इस जगह पर स्थित हस्तिनापुर और किला परीक्षितगढ़ महाभारत काल के कई रहस्यों का गढ़ माना जाता है।

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Mahabharat Kila Parikshitgarh: उत्तर प्रदेश में महाभारत काल की धरती मेरठ अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए जानी जाती है। इस जगह पर स्थित हस्तिनापुर और किला परीक्षितगढ़ महाभारत काल के कई रहस्यों का गढ़ माना जाता है। इन्हीं में से एक है किला परीक्षितगढ़ का श्री श्रृंगी ऋषि आश्रम, जिसके बारे में सदियों से मान्यताएँ चली आ रही हैं। एक किवदंती के अनुसार कलियुग का आरंभ यहीं से हुआ था।

कहां से हुआ कलियुग का आरंभ?

न्यूज़ 18 की एक रिपोर्ट के अनुसार विशेषज्ञ एवं सहायक प्राध्यापक प्रियांक भारती ने बताया कि किला परीक्षितगढ़ का नाम अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित के नाम पर रखा गया है। यह स्थान कभी राजा परीक्षित का राज्य था और यहाँ श्रृंगी ऋषि का प्राचीन आश्रम स्थित है। इस आश्रम से जुड़ी एक मान्यता है कि कलियुग का आरंभ यहीं से हुआ था। कहते हैं कि सरस्वती नदी के तट पर शिकार खेलते समय राजा परीक्षित के सामने कलयुग पहली बार प्रकट हुआ। कलयुग ने राजा के मुकुट में प्रवेश किया और स्वर्ग में स्थान माँगा। इसके बाद कलयुग ने राजा परीक्षित की बुद्धि को प्रभावित करना शुरू कर दिया।

राजा परीक्षित का ऋषि शमीक से विवाद

एक प्रसंग के अनुसार, जब राजा परीक्षित को प्यास लगी, तो वे श्रृंगी ऋषि के आश्रम पहुँचे। वहाँ ऋषि शमीक तपस्या में लीन थे। राजा परीक्षित ने उनसे जल माँगा, लेकिन ऋषि की तपस्या भंग नहीं हुई। क्रोधित राजा परीक्षित ने एक मरा हुआ साँप उठाकर ऋषि शमीक के गले में डाल दिया। यह देखकर ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी ऋषि ने राजा परीक्षित को श्राप दिया कि सात दिनों के भीतर सर्पदंश से उनकी मृत्यु हो जाएगी।

राजा परीक्षित की मृत्यु

शाप के अनुसार, अनेक प्रयासों के बावजूद, राजा परीक्षित को राजा तक्षक ने डस लिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। यह घटना महाभारत काल के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और आज भी इस क्षेत्र में इससे संबंधित चिन्ह देखे जा सकते हैं।

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जनमेजय का शाप यज्ञ

अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए, राजा जनमेजय ने एक विशाल शाप यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सभी सर्पों की बलि दी जा रही थी। अंत में, राजा तक्षक और वासुकि की बारी आई। जब राजा वासुकि ने देवी-देवताओं से सहायता मांगी, तो भगवान इंद्र और ऋषि आस्तिक मुनि ने जनमेजय को यज्ञ रोकने के लिए राजी किया। इसके बाद यज्ञ समाप्त हुआ और राजा तक्षक और वासुकि के प्राण बच गए। कहा जाता है कि श्रृंगी ऋषि आश्रम में आज भी शाप यज्ञ के चिन्ह मौजूद हैं। ये चिन्ह महाभारत काल की घटनाओं की जीवंत गाथा प्रस्तुत करते हैं।

धार्मिक रूप से बहुत फेमस है ये जगह

परीक्षितगढ़ किला और श्रृंगी ऋषि आश्रम न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यह स्थान इतिहास के उन अध्यायों को भी जीवंत करता है जो महाभारत काल की घटनाओं से जुड़े हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालु और इतिहास प्रेमी इन स्थानों की दिव्यता और प्राचीनता का अनुभव करते हैं।

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Disclaimer: इस आलेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है। पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। इन खबर इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है।

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