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Dhanteras 2025: क्यों मनाया जाता है धनतेरस? जानिए वो प्राचीन कथा जो आज भी देती है समृद्धि का संदेश

Dhanteras 2025: धनतेरस का त्योहार एक पौराणिक कथा पर आधारित है जो न केवल ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में भी उतनी ही प्रासंगिक है.

Dhanteras 2025 Date : भारतीय परंपरा में, स्वास्थ्य को हमेशा से सबसे बड़ा धन माना गया है. यही कारण है कि “पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख घर में धन” वाली यह पुरानी कहावत आज भी लोगों की सोच में समाई हुई है. इसी दर्शन के अनुरूप, दिवाली की शुरुआत भी धनतेरस से होती है, जो इस सांस्कृतिक दृष्टिकोण का पूर्ण समर्थन करती है.धनतेरस का त्योहार एक पौराणिक कथा पर आधारित है जो न केवल ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में भी उतनी ही प्रासंगिक है. आइए जानें इस अद्भुत त्योहार के पीछे की प्रेरक कहानी और हमारे जीवन से इसके संबंध के बारे में.

धनतेरस 2025 तिथि

धनतेरस शनिवार, 18 अक्टूबर को मनाया जाएगा. पंचांग के अनुसार, त्रयोदशी तिथि 18 अक्टूबर को दोपहर 12:18 बजे से शुरू होकर 19 अक्टूबर को दोपहर 1:51 बजे तक रहेगी. हिंदू धर्म में, उदयातिथि के रूप में जानी जाने वाली प्रातःकालीन तिथि का उपयोग तिथि निर्धारण के लिए किया जाता है.

धनतेरस की कथा

धनतेरस से जुड़ी एक प्राचीन कथा के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को भगवान विष्णु ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की एक आंख फोड़ दी थी, क्योंकि उन्होंने देवताओं के कार्य में बाधा डालने का प्रयास किया था. कहा जाता है कि जब राजा बलि के अपार प्रभाव और शक्ति से देवता भयभीत हो गए, तो भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण करके स्थिति को नियंत्रित करने का निर्णय लिया. वामन रूप में, वे राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे. हालांकि, शुक्राचार्य ने वामन को पहचान लिया और बलि को चेतावनी दी कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि स्वयं विष्णु हैं, जो उनसे सब कुछ दान में लेने आए हैं. उन्होंने बलि से वामन से कोई भी वचन न देने का अनुरोध किया.राजा बलि ने अपने गुरु की बात अनसुनी करते हुए भगवान वामन से पूछा कि उन्हें क्या चाहिए. वामन ने दान में तीन पग भूमि मांगी. जब बलि ने मन्नत मांगने के लिए अपने कमंडल से जल निकालना चाहा, तो शुक्राचार्य ने छोटा रूप धारण कर कमंडल के जल को अवरुद्ध कर दिया. भगवान वामन इस युक्ति को समझ गए और उन्होंने अपने हाथ से कुशा (घास) कमंडल के जलमार्ग में डाल दी, जिससे शुक्राचार्य की एक आंख चोटिल हो गई और वह बाहर आ गई. तब बलि ने तीन पग भूमि दान करने का अपना वचन पूरा किया. भगवान वामन ने एक पग में पूरी पृथ्वी, दूसरे में आकाश नाप लिया, और जब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची, तो बलि ने विनम्रतापूर्वक उनके सामने अपना सिर झुका दिया. इस प्रकार, बलि ने अपना सब कुछ दान कर दिया. कहा जाता है कि देवताओं ने बलि से प्राप्त धन और समृद्धि को और भी अधिक मात्रा में लौटा दिया. इस घटना की याद में धनतेरस का त्यौहार धन और समृद्धि के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है.

Disclaimer : प्रिय पाठक, हमारी यह खबर पढ़ने के लिए शुक्रिया. यह खबर आपको केवल जागरूक करने के मकसद से लिखी गई है. हमने इसको लिखने में सामान्य जानकारियों की मदद ली है. inkhabar इसकी पुष्टि नहीं करता है.

Shivashakti Narayan Singh

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