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अब पैरेंट्स की सैलरी से तय नहीं होगा आरक्षण का अधिकार, OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

Supreme Court Verdict Other Backward Class: कोई OBC महिला क्रीमी लेयर में आती है या नहीं, यह कैसे तय किया जाना चाहिए. इसके लिए क्या उसके पति की इनकम जोड़ी जानी चाहिए या फिर पिता की आय को आधार माना जाए. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दे दिया है.

Published by JP Yadav

Supreme Court Verdict Other Backward Class: अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में क्रीमी लेयर तय करने के मानदंडों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (12 मार्च, 2026) को बेहद अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि क्रीमी लेयर तय करने के लिए इनकम अकेला क्राइटेरिया नहीं हो सकता है. कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि बिना किसी सही वजह के एक ही पिछड़े वर्ग के एक हिस्से को नुकसान पहुंचाने वाली व्याख्या अपनाना ‘बराबर को असमान’ मानने जैसा होगा.

इसके बाद माना जा रहा है कि OBC में क्रीमीलेयर को लेकर बहस तेज हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करने के साथ यह भी कहा कि दूसरे पिछड़े वर्गों (OBC) में क्रीमी लेयर तय करने का तरीका सरकारी कर्मचारियों की तरह ही पब्लिक सेक्टर या प्राइवेट कर्मचारियों के बच्चों के लिए भी एक जैसा होना चाहिए. 

60 से अधिक UPSC कैंडिडेट को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत

यहां पर बता दें कि UPSC परीक्षा से बाहर हुए OBC 60 से अधिक कैंडिडेट को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. इसके साथ ही कोर्ट ने 60 से अधिक UPSC कैंडिडेट को नियुक्त करने का आदेश दिया है. क्रीमीलेयर को परिभाषित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर माता-पिता ग्रुप IV में सरकारी नौकरी करते हैं, साथ ही अगर उनकी आय 8 लाख रुपये प्रतिवर्ष से ऊपर हो गई है, तो भी उसे क्रीमी लेयर में नहीं जोड़ा जाएगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में कृषि आय को भी नहीं जोड़ा जाएगा. केवल ‘अन्य स्रोतों’ (बिजनेस, प्रॉपर्टी आदि) से परिवारिक आय (3 साल) 8 लाख प्रति वर्ष से कम होनी चाहिए. 

और क्या-क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आर महादेवन की बेंच ने कहा कि क्रीमी लेयर को बाहर करने का मकसद यह पक्का करना है कि OBC वर्ग के अंदर सामाजिक रूप से आगे रहने वाले लोग असल में पिछड़े लोगों के लिए बने फायदों का फायदा न उठा पाएं. इसका मकसद एक ही सामाजिक वर्ग के बराबर लोगों के बीच बनावटी फर्क पैदा करना नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि बिना किसी सही वजह के एक ही पिछड़े वर्ग के एक हिस्से को नुकसान पहुंचाने वाला मतलब ‘बराबर को गैर-बराबर’ मानना ​​होगा. इस तरह यह रिपब्लिक की नींव है के बिल्कुल उलट हो जाएगा. 

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यहां पर बता दें कि तीन-तीन हाई कोर्ट के फैसलों के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. हाई कोर्ट ने कहा था कि सरकारी कर्मचारियों की तुलना में PSUs के लिए क्रीमी लेयर तय करने के लिए इनकम कैलकुलेट करने के लिए अपनाए गए अलग-अलग पैमानों को भेदभावपूर्ण है. टॉप कोर्ट ने कहा कि OBC माता-पिता का क्रीमी लेयर स्टेटस तय करने के लिए इनकम ही एकमात्र क्राइटेरिया नहीं हो सकता.

दरअसल, मद्रास, दिल्ली और केरल के हाई कोर्ट ने यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) परीक्षा में अपने स्कोर के आधार पर सिविल सर्विस में एंट्री चाहने वाले तीन OBC कैंडिडेट के मामलों पर विचार किया. उनके पक्ष में वेरिफिकेशन के बाद तीनों को क्रीमी लेयर में शामिल माना गया. इसके बाद तीनों ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट का रुख किया. इसमें केंद्र को उन्हें OBC नॉन-क्रीमी लेयर मानने का निर्देश दिया था. 

क्रीमी लेयर के लिए क्राइटेरिया पर उठ चुके हैं सवाल

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि वर्ष 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (OM) को मानें तो क्रीमी लेयर के लिए क्राइटेरिया तय करता है. वर्ष 2004 में केंद्र द्वारा जारी एक क्लैरिफिकेशन लेटर के मुताबिक, PSUs और प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले OBC माता-पिता के बच्चों के साथ क्रीमी लेयर तय करने के मामले में भेदभाव किया जा रहा है.

वर्ष 1993 के OM या 2004 के लेटर का कोई भी ऐसा मतलब निकालना जिससे समान रैंक वाले OBC कैंडिडेट्स के साथ अलग तरह का बर्ताव हो, न केवल कानूनी तौर पर गलत होगा बल्कि संवैधानिक रूप से भी गलत होगा.  

वहीं, 14 अक्तूबर 2004 को केंद्र की तरफ से जारी एक लेटर में यह माना गया कि जहां PSUs और इसी तरह के संगठनों में पदों की बराबरी का मूल्यांकन नहीं किया गया है, वहां क्रीमी लेयर का स्टेटस इनकम/वेल्थ टेस्ट के आधार पर तय हो.

JP Yadav
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