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बेटी के सम्मान की लड़ाई, पिता ने किया कुछ ऐसा कि रेलवे भी हुआ झुकने पर मजबूर

Railway Concession Certificates: रेलवे ने दिव्यांग व्यक्तियों के रियायती प्रमाणपत्रों में “मानसिक रूप से विकृत” शब्द की जगह “बौद्धिक अक्षमता” शब्द अपनाया, पंकज मारु की शिकायत और CCPD के निर्देश के बाद.

Published by sanskritij jaipuria

Railway Concession Certificates: भारत में हाल ही में रेलवे ने अपने रियायती प्रमाणपत्रों (Railway Concession Certificates) में एक बड़ा बदलाव किया. पहले इन प्रमाणपत्रों में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए “मानसिक रूप से विकृत” शब्द लिखा जाता था. ये शब्द न केवल अपमानजनक था बल्कि इससे व्यक्ति की गरिमा और आत्म-सम्मान को चोट पहुंचती थी. अब रेलवे ने इसे बदलकर “बौद्धिक अक्षमता” (Intellectual Disability) कर दिया है.

इस बदलाव के पीछे एक पिता की लंबी और हिम्मत भरी लड़ाई है. इस कहानी में दिखता है कि कैसे एक आम नागरिक भी सिस्टम को बदल सकता है.

पंकज मारु और उनकी बेटी सोनू की कहानी

नागदा, उज्जैन के पंकज मारु लंबे समय से दिव्यांग अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं. उनकी बेटी सोनू मारु 26 साल की हैं और उनमें 65% बौद्धिक अक्षमता है. 2019 में जब पंकज ने रेलवे से अपनी बेटी के लिए रियायती प्रमाणपत्र लिया, तो उसमें उनकी बेटी की स्थिति को “मानसिक रूप से विकृत” लिखा गया. पंकज ने अपने आवेदन के साथ बेटी का यूनिक डिसेबिलिटी आईडी कार्ड (Unique Disability ID) भी जमा किया था. उस कार्ड में उनकी बेटी की विकलांगता को सही शब्द “बौद्धिक अक्षमता” के साथ लिखा गया था.

यानी, कानून के हिसाब से (Rights of Persons with Disabilities Act 2016) ये सही था, लेकिन रेलवे ने फिर भी अपमानजनक शब्द लिखा. पंकज ने रेलवे अधिकारियों से कई बार संपर्क किया, लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला. अंततः पंकज ने 12 जुलाई को चीफ कमिश्नर फॉर पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज (CCPD) के पास शिकायत दर्ज कराई.

अदालत का आदेश

CCPD ने इस मामले की सुनवाई की और रेलवे को निर्देश दिया कि वे अपने दस्तावेजों में अपमानजनक शब्दों का उपयोग बंद करें. रेलवे ने अदालत को बताया कि उन्होंने 9 मई को नई गाइडलाइन जारी कर दी है. इसके अनुसार अब “mentally retarded persons who cannot travel without an escort” की जगह “persons with intellectual disability who cannot travel without an escort” लिखा जाएगा. ये बदलाव 1 जून से लागू हो गया.

भाषा का महत्व

CCPD ने विशेष रूप से कहा कि भाषा का चुनाव दिव्यांग व्यक्तियों की गरिमा और सम्मान बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी है. अदालत ने ये भी कहा कि रेलवे ने पहले भी कई शब्दों में बदलाव किया था. जैसे कि “अंधा”, “बहरा और गूंगा”, “शारीरिक रूप से विकलांग” के बजाय अब RPwD एक्ट में बताए गए सम्मानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है. अदालत ने रेलवे से कहा कि वे अपने सभी फॉर्म और दस्तावेजों की समीक्षा करें और भविष्य में कोई अपमानजनक भाषा न इस्तेमाल हो.

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पुराने और अपमानजनक शब्दों की समस्या

पंकज मारु ने ये भी बताया कि पुराने प्री-प्रिंटेड प्रमाणपत्रों में अब भी “Handicapped” जैसे अपमानजनक शब्द मौजूद हैं. ये शब्द न केवल पुराने सोच को दर्शाते हैं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के नियमों का उल्लंघन भी हैं. सुप्रीम कोर्ट और RPwD एक्ट में कहा गया है कि दिव्यांग व्यक्तियों के लिए हमेशा सम्मानजनक और संवेदनशील भाषा का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

CCPD ने रेलवे से कहा कि तीन महीनों के भीतर वे एक रिपोर्ट पेश करें कि उन्होंने कौन-कौन से कदम उठाए हैं. साथ ही सभी कर्मचारियों को दिव्यांगता और उसके प्रकार के बारे में संवेदनशील बनाने के निर्देश दिए.

रेलवे का तर्क और अदालत का फैसला

रेलवे का तर्क था कि RPwD एक्ट में बौद्धिक अक्षमता और मानसिक व्यवहार अलग-अलग हैं. उनका कहना था कि “mental retardation” मानसिक व्यवहार में आता है. लेकिन CCPD ने इस तर्क को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि कानून में “mental behaviour” की परिभाषा में “retardation” शामिल नहीं है. इसलिए रेलवे का ये कहना सही नहीं है.

अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देश

CCPD ने संयुक्त राष्ट्र (UN) के Disability Inclusive Language Guidelines का भी हवाला दिया. इसमें कहा गया है कि “retarded” और “mentally handicapped” जैसे शब्दों से बचना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के हैंडबुक में भी लिखा है कि दिव्यांग व्यक्तियों के मामलों में संवेदनशील और सम्मानजनक भाषा का उपयोग जरूरी है.

समाज और सिस्टम पर प्रभाव

ये बदलाव केवल शब्द बदलने तक सीमित नहीं है. ये समाज में सोच और दृष्टिकोण बदलने का संकेत है. भले ही शब्द छोटा लगे, लेकिन सही भाषा से दिव्यांग व्यक्तियों का सम्मान बढ़ता है. ये उनका आत्म-सम्मान और गरिमा बनाए रखने का पहला कदम है. रेलवे जैसी बड़ी संस्था में यह बदलाव एक उदाहरण बनता है. इससे ये संदेश जाता है कि सरकारी और निजी संस्थाओं को संवेदनशील और समानता आधारित बनाना जरूरी है.

sanskritij jaipuria

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