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PM मोदी सरकार का बड़ा दांव, पहली बार देश में रेयर अर्थ मैग्नेट्स का होगा उत्पादन; यहां जानें क्या है पूरी योजना?

Rare Earths Mineral: टाइमलाइन में प्लांट सेटअप के लिए दो साल का जेस्टेशन पीरियड, उसके बाद पांच साल का इंसेंटिव डिस्बर्समेंट शामिल है, जिससे यह कुल मिलाकर सात साल की स्कीम बन जाती है.

Published by Shubahm Srivastava

India Critical Minerals Mission: पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली भारत की कैबिनेट ने 26 नवंबर 2025 को सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPMs) का घरेलू प्रोडक्शन शुरू करने के लिए 7,280 करोड़ की एक अहम स्कीम को मंज़ूरी दी. इस अपनी तरह की पहली पहल के तहत, भारत का लक्ष्य 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MTPA) REPM बनाने की क्षमता वाला एक इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम बनाना है.

यह स्कीम पूरी वैल्यू चेन को कवर करती है — रेयर अर्थ ऑक्साइड को मेटल में, मेटल को एलॉय में, और एलॉय को तैयार REPM में बदलना — न कि सिर्फ़ कंपोनेंट्स को असेंबल करना.

पैकेज का कैसे होगा इस्तेमाल?

फाइनेंशियल तौर पर, 7,280 करोड़ के पैकेज में पांच सालों में सेल्स-लिंक्ड इंसेंटिव के तौर पर ₹6,450 करोड़, साथ ही मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने के लिए कैपिटल सब्सिडी के तौर पर ₹750 करोड़ शामिल हैं.

यह कैपेसिटी ज़्यादा से ज़्यादा पांच बेनिफिशियरी फर्मों में बांटी जाएगी, जिनमें से हर एक ज़्यादा से ज़्यादा 1,200 MTPA के लिए एलिजिबल होगी, जिन्हें ग्लोबल कॉम्पिटिटिव बिडिंग प्रोसेस के जरिए चुना जाएगा.

टाइमलाइन में प्लांट सेटअप के लिए दो साल का जेस्टेशन पीरियड, उसके बाद पांच साल का इंसेंटिव डिस्बर्समेंट शामिल है, जिससे यह कुल मिलाकर सात साल की स्कीम बन जाती है.

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भारत में क्या है इसका महत्व?

REPMs दुनिया भर में सबसे मजबूत परमानेंट मैग्नेट में से हैं, और वे कई हाई-टेक और स्ट्रेटेजिक सेक्टर्स के लिए ज़रूरी हैं — जिसमें इलेक्ट्रिक व्हीकल, रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और डिफेंस इक्विपमेंट शामिल हैं. अब तक, भारत में REPMs की लगभग पूरी डिमांड इम्पोर्ट से पूरी होती रही है — जिससे देश ग्लोबल सप्लाई-चेन में रुकावटों के प्रति कमज़ोर हो गया है.

2030 तक डिमांड लगभग दोगुनी होने का अनुमान है, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी EVs, क्लीन-एनर्जी प्रोजेक्ट्स और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी सेक्टर्स में बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करेगी.

‘विकसित भारत 2047’ को लेकर बड़ा कदम

सप्लाई सिक्योरिटी के अलावा, यह स्कीम आत्मनिर्भर भारत के बड़े नेशनल एजेंडा में मदद करती है और 2070 तक नेट जीरो एमिशन और “विकसित भारत 2047” जैसे लंबे समय के लक्ष्यों को सपोर्ट करती है.

अगर इसे ठीक से लागू किया जाए — ज़रूरी टेक्नोलॉजी, ज़िम्मेदार माइनिंग और प्रोसेसिंग तक पहुंच के साथ — तो यह कदम भारत की इम्पोर्ट पर निर्भरता को काफ़ी कम कर सकता है, रोजगार पैदा कर सकता है, और देश को जरूरी मटीरियल और टेक्नोलॉजी में दुनिया भर में एक कॉम्पिटिटिव प्लेयर के तौर पर खड़ा कर सकता है.

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Shubahm Srivastava

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