NXT Conclave 2026: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ( एआई) के तेजी से बढ़ते दौर में यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या भविष्य में रोबोट या एआई न्यायपालिका की जगह ले सकते हैं. नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित NXT कॉन्क्लेव 2026 में देश के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इस बहस पर स्पष्ट जवाब दिया. उन्होंने कहा कि तकनीक न्यायपालिका की मदद जरूर कर सकती है, लेकिन न्याय का अंतिम आधार हमेशा मानवीय संवेदना, तर्क और विवेक ही रहेगा.
भारत मंडपम में जुटे दुनिया के सांसद
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित तीन दिवसीय NXT कॉन्क्लेव 2026 में दुनिया के 40 से अधिक देशों के करीब 100 सांसद और वरिष्ठ नेता शामिल हुए हैं. इस मंच पर भारत की प्रगति और भविष्य की दिशा पर चर्चा हो रही है. कॉन्क्लेव के दौरान आज शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘भारत प्रोग्रेस रिपोर्ट’ भी जारी करेंगे.
कानून एक नदी, तकनीक उसकी धार
अपने संबोधन में जस्टिस सूर्यकांत ने यूनानी दार्शनिक हेराक्लीटस का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह कोई व्यक्ति एक ही नदी में दो बार कदम नहीं रख सकता, क्योंकि उसका पानी बदलता रहता है, उसी तरह कानून भी एक जीवित व्यवस्था है. उन्होंने कहा कि नियम बदलते रहते हैं, लेकिन न्याय का मूल आधार हमेशा स्थिर रहता है.
पत्थर के शिलालेख से पिक्सल की दुनिया तक
मुख्य न्यायाधीश ने न्याय व्यवस्था के विकास का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया मेसोपोटामिया के पत्थर के शिलालेखों और ताड़ के पत्तों से आगे बढ़कर प्रिंटिंग प्रेस तक पहुंची और अब न्यायपालिका ‘कागज की दुनिया’ से ‘पिक्सल की दुनिया’ में प्रवेश कर चुकी है. उनके अनुसार यह बदलाव न्याय को अधिक सुलभ और लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में बड़ा कदम है.
एआई से डर नहीं, जिम्मेदारी जरूरी
तकनीक और एआई को लेकर बढ़ती आशंकाओं पर उन्होंने कहा कि तकनीक को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसे जिम्मेदारी के ढांचे में ढालना जरूरी है. उन्होंने एक कहावत का जिक्र करते हुए कहा कि हवा को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके साथ तालमेल बैठाने के लिए पवनचक्कियां बनाई जा सकती हैं.
16 भाषाओं में फैसले पढ़ सकेंगे लोग
जस्टिस सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट के ‘सुआस’ सॉफ्टवेयर का जिक्र करते हुए बताया कि यह एआई आधारित टूल सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का 16 क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद कर रहा है. इससे तमिलनाडु का किसान या पश्चिम बंगाल का छोटा व्यापारी भी अपनी भाषा में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को पढ़ और समझ सकता है.
वर्चुअल सुनवाई से आसान हुई न्याय तक पहुंच
उन्होंने राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड और ई-कोर्ट प्रोजेक्ट की भी सराहना की. इसके जरिए अब देश के दूरदराज इलाकों के लोग भी वर्चुअल माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से जुड़ सकते हैं. वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के करीब एक-तिहाई मामलों की सुनवाई वर्चुअल माध्यम से हो रही है, जिससे समय और खर्च दोनों की बचत हो रही है.
एआई की सीमाओं पर भी दी चेतावनी
जस्टिस ने यह भी कहा कि एआई बहुत तेजी से जवाब दे सकता है, लेकिन वह उसके पीछे का तर्क नहीं समझा सकता. न्याय केवल गणितीय परिणाम नहीं होता, बल्कि इसमें मानवीय सोच और नैतिकता की भी जरूरत होती है. उन्होंने अदालतों में एआई द्वारा तैयार काल्पनिक फैसलों या फर्जी मिसालों के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई और इसे गंभीर पेशेवर कदाचार बताया.
‘स्मार्ट कोर्ट’ की कल्पना
अपने भाषण के अंत में मुख्य न्यायाधीश ने भविष्य की ‘स्मार्ट कोर्ट’ की कल्पना पेश की. उन्होंने कहा कि यदि परंपरा और तकनीक के बीच संतुलन बनाया जाए तो कानून और एआई मिलकर ऐसी न्याय व्यवस्था बना सकते हैं, जो तर्क, नैतिकता और सहानुभूति के साथ समाज को बेहतर दिशा दे सके.

