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ghantewala sweet shop: हाथी भेजकर मुगल बादशाह मंगवाते थे मिठाई, अंग्रेजों को भी भा गया था स्वाद; जानें कैसे पड़ा घंटेवाला नाम?

ghantewala sweet shop Interesting facts: पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में स्थित घंटेवाला मिठाई की दुकान 1790 से अस्तित्व में है. कभी यहां की दुकानों के मुरीद जवाहर लाल नेहरू तक थे.

Published by JP Yadav

rahul gandhi visit ghantewala sweet shop: ‘घुमक्कड़ी’ करने के दौरान राहुल गांधी (Rahul Gandhi) कुछ ऐसा कर जाते हैं जो सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है. पिछले कुछ सालों के दौरान वह विभिन्न पेशों से जुड़े लोगों के पास जाते हैं और यहां पर गुजारे अपने अनुभव सोशल मीडिया पर शेयर भी करते हैं. इन अनुभवों से जुड़ी बातों और वीडियोज को सोशल मीडिया पर खूब शेयर भी किया जाता है. ताजा कड़ी में रायबरेली से लोकसभा सांसद राहुल गांधी  सोमवार (20 अक्टूबर, 2025) को पुरानी दिल्ली की मशहूर और ऐतिहासिक घंटेवाला मिठाई की दुकान पर पहुंचे. यहां पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपने अलग अंदाज में दिवाली का त्योहार मनाया. इस दौरान उन्होंने इमरती और बेसन के लड्डू बनाने की कोशिश की. यह जानकारी खुद राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा की. इस स्टोरी में हम जानेंगे मुगलकालीन घंटेवाला मिठाई की दुकान के बारे में.

ठेले पर चीनी और मावा बेचते थे इसके संस्थापक (Founder Lala Sukhlal Jaina used to sell sugar and mawa on a cart)

दावा किया जाता है कि घंटेवाला मिठाई की दुकान का इतिहास 270 साल पुराना है. इस दौरान देश में मुगलों का शासन था. घंटेवाला के संस्थापक थे लाला सुखलाल जैना. वह अमेरिका से दिल्ली आए तो यहां ठेले पर चीनी और मावा बेचने का काम करने लगे. वह घंटी बजाकर लोगों का ध्यान अपने ठेले की ओर खींचते थे. वह गली-मोहल्लों में अपना ठेला लेकर घूमते और घर-घर जाकर मिठाइयां बेचते थे. मिठाइया बड़ी ही स्वादिष्ट हुआ करती थीं. धीरे-धीरे वह ‘गंटेवाला’ के नाम से मशहूर हो गए. कुछ समय बाद लाला सुखलाल जैना ने एक व्यवसाय शुरू किया और इसका नाम रखा गंटेवाला.

मुगलकाल से हुई घंटेवाला दुकान की शुरुआत (History of Ghantewala shop from Mughal period)

यह भी कहा जाता है कि मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के दरबार से भी इसका कनेक्शन है. शाह आलम को मीठा खाने का मन हुआ तो उन्होंने अपने सेवक से घंटे के नीचे वाली दुकान यानी  घंटी के नीचे की दुकान से मिठाई खरीद कर लाने के लिए कहा. यह मिठाई शाह आलम को खूब पसंद आई. धीरे-धीरे यह दुकान आसपास के इलाकों में खासतौर से पुरानी दिल्ली में खूब मशहूर हो गई. समय बीतने के साथ घंटी के नीचे की दुकान का नाम छोटा करके गंटेवाला कर दिया गया. ऐसा कहा जाता है कि लाल किले में रहने वाले मुगलों को दुकान के बगल में बने स्कूल में घंटी की आवाज़ भी सुनाई देती थी. इसके चलते घंटेवाला की दुकान भी मशहूर हो गई. ऐसा कहा जाता है कि अपने दरबार के लिए इस दुकान से मिठाई मंगवाने के लिए मुगल बादशाह हाथी तक भेजा करते थे.  सोहन हलवा के अलावा पिस्ता बर्फी, मोतीचूर के लड्डू, कलाकंद और कराची हलवा लोगों को खूब पसंद आते हैं. कभी मक्खन चूरा जैसे स्नैक्स भी यहां की खासियत थे. यहां की मिठाइयां मुगलों के बाद अंग्रेजों का भी स्वाद बढ़ाने लगीं. भारतीय नेता भी यहां की मिठाई के स्वाद के दीवाने थे. 

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आखिर कैसे हुआ गंटेवाला से घंटेवाला नाम (Name changed from Gantewala to Ghantewala)

एक दंतकथा यह भी है कि एक बार एक हाथी अपने गले में एक घंटी पहनकर पुरानी दिल्ली की सड़कों से गुजर रहा था. इस दौरान जब सड़क को पार करता तो घंटी की आवाज तेज सुनाई देती थी. एक बार हाथी कैंडी स्टोर के सामने रुका और  उसने तेज गति से अपनी गर्दन हिलाई. इसका शोर दूर तक गया. इसके यहां पर बने स्टोर का नाम ही गंटेवाला रख दिया गया. समय के साथ इसे घंटेवाला नाम मिल गया. 

7 पीढ़ियों से चल रही दुकान (Ghantewala shop running for 7 generations)

यह दुकान 7 पीढ़ियों से चल रही है. 7वीं पीढ़ी में सक्रिय सुशांत जैन का कहना है कि वर्ष 2015 में उनकी इस दुकान में 40 से 50 तरह की मिठाइयां थीं. दुकान की खास बात यह है कि यहां पर मौसम या त्योहारों के अनुसार मिठाइयां और मेन्यु बदलता है. कुछ सालों के दौरान परिवार अलग हुआ तो नजदीक ही फव्वारे के पास एक और दुकान खोली गई जबकि एक दुकान बंद करनी पड़ी. इसी तरह एक अन्य दुकान का बदलकर घंटेवाला कन्फेक्शनर्स रख लिया गया. इसे निर्मल जैन चलाते हैं. यह दुकान चांदनी चौक में गली परांठे वाली के पास मौजूद है. बहुत कम लोग जानते हैं कि जुलाई, 2015 में बिक्री में गिरावट के साथ दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के साथ चले कानूनी मुद्दों के कारण दुकान बंद करने पड़ी. इसके बाद नवंबर 2024 में फिर से खोला गया.  इसके बाद यह दुकान लगातार चल रही है. 

JP Yadav

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