Ramadan 2026: रोज़े के बीच शुरू हो जाए पीरियड्स तो क्या करें? इस्लामिक नियम समझिए
Ramadan 2026: जैसा की आप सभी जानते हैं कि रमज़ान का महीना चल रहा है, जिसके चलते मुस्लिम पूरे महीने रोज़े रखते हैं. बता दें कि रोज़ा सुबह सूरज निकलने से पहले शुरू होता है और शाम को सूरज डूबने तक चलता है. इस दौरान, लोग खाने-पीने से परहेज़ करते हैं, और शाम को इफ्तार करते हैं. रमज़ान में, रोज़ा रखने के साथ-साथ, दिन में 5 वक्त की नमाज़ पढ़ना, सब्र रखना और ज़रूरतमंदों की मदद करना भी बहुत ज़रूरी माना जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस्लाम में रोज़ा रखने के कुछ खास नियम होते है; हालाँकि, कुछ खास हालात में लोगों को रोज़ा रखने से छूट भी दी जाती है. वहीं आज हम आपको इस बात का जवाब देंगे कि क्या महिलाएं पीरियड्स में रोज़ा रख सकती हैं या नहीं? और अगर रोज़े की हालत में हों और पीरियड्स हो जाएं तो क्या करते हैं?
क्या पीरियड्स में रख सकते हैं रोज़ा ?
इस्लामी नियमों के मुताबिक, किसी महिला के लिए पीरियड्स के दौरान रोज़ा रखना न तो सही माना जाता है और न ही इसकी इजाज़त है. अगर किसी महिला को लगता है कि उसका मासिक धर्म शुरू होने वाला है, तो वो रोज़ा न रखने का फैसला कर सकती है.
बाद में रखने होते हैं रोज़े
मासिक धर्म खत्म होने के बाद, छूटे हुए दिनों के रोज़े बाद में रखकर उनकी भरपाई करना ज़रूरी होता है. अगर कोई महिला छूटे हुए दिनों के लिए *क़ज़ा* (बाद में रखे जाने वाले रोज़े) पूरे नहीं करती है, तो इसे गुनाह माना जाता है.
रोज़ा रखने से पहले नियत जरूरी
इस्लाम के मुताबिक, फज्र (सुबह) की नमाज़ से पहले रोज़ा रखने की नियत (इरादा) करना ज़रूरी है. जिस व्यक्ति ने रोज़ा रखने की नियत नहीं की है, चाहे रात में या फज्र से पहले, उसका रोज़ा सही नहीं माना जाता है.
क्या पीरियड्स होने पर तोड़ सकते हैं रोज़ा?
अगर कोई महिला अगले दिन का रोज़ा रखने की नियत करती है, और साथ ही यह भी सोचती है कि अगर उसका मासिक धर्म शुरू हो गया तो वो रोज़ा तोड़ देगी, तो ऐसा करने में कोई दिक्कत नहीं है. इसे नियत की कमज़ोरी नहीं माना जाता; बल्कि, रोज़े की नियत को पूरी तरह से सही माना जाता है.
पीरियड्स में रोज़ा छोड़ना जायज
अगर रमज़ान के दौरान पीरियड्स शुरू हो जाएँ तो उस समय महिला रोज़ा नहीं रखती. उस दिन का रोज़ा छोड़ना जायज़ होता है.
पीरियड्स में क्या करना चाहिए और क्या नहीं?
पीरियड्स में नमाज़ माफ़ होती है और उसकी क़ज़ा नहीं होती. रोज़ा नहीं रखा जाता, लेकिन बाद में उसकी क़ज़ा रखनी होती है. दुआ, ज़िक्र और अल्लाह को याद करना जारी रखा जा सकता है.