When did the Jagannath Rath Yatra start?: जगन्नाथ रथ यात्रा कब शुरू हुई थी?
जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत बहुत प्राचीन काल में हुई थी, और इसका वर्णन हजारों वर्षों पुराने ग्रंथों में मिलता है। यह यात्रा हर साल ओडिशा के पुरी शहर में आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि (अर्थात जून-जुलाई में) को निकलती है यह रथ यात्रा बहुत सुन्दर होती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार
यह यात्रा भगवान श्रीकृष्ण (जगन्नाथ), बलभद्र और सुभद्रा के पुरी में दर्शन हेतु नगर भ्रमण का प्रतीक है। माना जाता है कि जब श्रीकृष्ण मथुरा से द्वारका गए, तब उन्होंने अपने नाते-रिश्तेदारों से मिलने की इच्छा जाहिर की थी। उसी भाव से यह यात्रा निकाली जाती है।
ऐतिहासिक प्रमाण
इतिहासकारों के अनुसार, रथ यात्रा का प्रारंभ 12वीं शताब्दी में हुआ, जब पुरी के श्रीमंदिर का निर्माण राजा अनंग भीम देव ने कराया (लगभग 1135 ईस्वी) यह एक बहुत पुरानी आदिवासी परंपरा से भी जुड़ी है।लेकिन इससे पहले भी वहाँ लोक परंपरा के रूप में यह यात्रा होती थी लेकिन इससे पहले भी वहाँ लोक परंपरा के रूप में यह यात्रा होती थी
स्कंद पुराण में उल्लेख
स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण, और पद्म पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में जगन्नाथ और रथ यात्रा का विस्तार से वर्णन मिलता है।
माना जाता है कि भगवान नारायण हर वर्ष अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए रथ पर सवार होते हैं।
रथ यात्रा खास है
यह एकमात्र ऐसी यात्रा है जिसमें भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलते हैं। और सभी जाति और धर्म के लोग उनके रथ को खीच सकता है।
जगन्नाथ रथ यात्रा कि शुरूआत
17 जुलाई अनुमानित काल 12वीं शताब्दी में वर्तमान रूप में शुरू (राजा अनंग भीम देव द्वारा) कि गई थी
पौराणिक रूप से हजारों वर्षों पुरानी परंपरा
ग्रंथों में उल्लेख स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण
धार्मिक उद्देश्य भगवान जगन्नाथ का नगर भ्रमण और भक्तों को सुलभ दर्शन देना है।
सांस्कृतिक दृष्टिकोण से
जगन्नाथ रथ यात्रा का औपचारिक आयोजन लगभग 870 से 900 साल पहले शुरू हुआ था तब से यह परंपरा हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया (जून-जुलाई) को मनाई जाती है। इस यात्रा को देखने लोग बहुत दूर दूर se आते है।
पुरी जगन्नाथ मंदिर दर्शाता
इन मूर्तियों में हाथ और पैर नहीं होते, चेहरा भी आधा-अधूरा दिखता है। इसका अर्थ है भगवान किसी भी रूप में आ सकते हैं अधूरे, पूरे, छोटे, बड़े
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