Lack of Hospitals Critical Illness India: यह मुद्दा किसी एक महिला का नहीं, बल्कि हर उस भारतीय का है जो दिल्ली एम्स को अपनी आखिरी उम्मीद मानता है दिल्ली एम्स पर पूरे उत्तर भारत का बोझ है, एक बेड के लिए सैकड़ों मरीज कतार में होते हैं जिससे तीमारदार (Relatives) मानसिक और शारीरिक रूप से टूट जाते हैं, अस्पतालों का निर्माण हालांकि सरकार का दावा है कि पिछले 10-12 वर्षों में कई नए AIIMS जैसे गोरखपुर, भटिंडा, बिलासपुर स्वीकृत और चालू हुए हैं, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि इनमें से अधिकांश अभी भी दिल्ली एम्स जैसा ‘टर्शरी केयर’ गंभीर रोगों का पूर्ण इलाज प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं आज भी कैंसर, न्यूरो और कार्डियक जैसी गंभीर स्थितियों के लिए लोग दिल्ली ही दौड़ते हैं, वायरल पोस्ट में यह कड़ा सवाल उठाया गया है कि समाज की प्राथमिकताएं क्या हैं? क्या हम बुनियादी स्वास्थ्य (Healthcare) के बजाय अन्य भावनात्मक मुद्दों पर वोट देते हैं? एम्स और सफदरजंग के बाहर फुटपाथ पर सो रहे मरीजों के परिजन स्वास्थ्य सेवाओं की किल्लत का जीवंत प्रमाण हैं, हाल ही में हाई कोर्ट की फटकार के बाद रैनबसेरों की योजना तो बनी है, लेकिन असली समाधान ‘अधिक अस्पतालों’ में ही छिपा है.
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