ईरान के ‘काले सोने’ पर क्यों टिकी है दुनिया की नजर? जानिए लिक्विड गोल्ड का रहस्य
Israel Crude Oil: ईरानी तेल की लोकप्रियता का राज किसी से छिपा नहीं है. ईरान से कई देश में तेल निर्यात किया जाता है. यह तेल अमेरिकी तेल के मुकाबले अधिक किफायती और मुनाफे का सौदा है. कार में ईंधन भरवाते या किसी विमान में सवार होने तक में ईधन के पीछे एक खास रिफाइनरी इंजीनियर का गणित छिपा होता है. दशकों से दुनिया भर के इंजीनियर बेहद बारीकी से ईरान के तेल को चुनते आए हैं. ईरान का कच्चा तेल रसायनिक रूप से एक ऐसे स्पॉट पर है, जिसे दूसरे देस के तेल से रिप्लेस करना लगभग मुश्किल और नुकसानदायक साबित हो सकता है.
कच्चा तेल अणुओं का मिश्रण
कच्चा तेल कोई नॉर्मल तरल पदार्थ नहीं है, बल्कि इसमें हजारों हाइड्रोकार्बन अणुओं का मिश्रण होता है. साथ ही कार्बन और हाइड्रोजन परमाणुओं की जंजीरें इसमें पाई जाती है. छोटी जंजीरें हल्की होती है, जिससे पेट्रोल या जेट ईंधन बनता है. वहीं लंबी और भारी जंजीरें डामर जैसा होता है.
कच्चे तेल की गुणवत्ता
कच्चे तेल की गुणवत्ता दो मुख्य पैमानों पर मापी जाती है, घनत्व और सल्फर की मात्रा.घनत्व को मापने के लिए 'API ग्रेविटी' का इस्तेमाल किया जाता है. बता दें कि, पानी का API ग्रेविटी 10 होती है.ईरानी लाइट क्रूड की API ग्रेविटी 33 से 36 के बीच मापी जाती है. जिस कारण इसे दुनिया भर की रिफाइनरियां सबसे ज्यादा पसंद करती हैं.
ईरानी तेल में सल्फर
ईरानी तेल में सल्फर की मात्रा 1.36 से 1.5 प्रतिशत तक पाई जाती है. कम सल्फर वाला तेल स्वीट और अधिक वाला सोर कहलाना है. ईरानी तेल को मध्यम स्तर की रिफाइनरियां बिना किसी भारी अतिरिक्त निवेश के प्रोसेस कर सकती हैं.
ईरानी लाइट क्रूड
ईरानी लाइट क्रूड की खासियत 'डिस्टिलेशन यील्ड' है. इसके एक बैरल में 20 प्रतिशत हल्का और
50 प्रतिशत 'मिडल डिस्टिलेट्स' प्राप्त किया जा सकता है. एक बैरल का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा प्रीमियम ईंधन में तब्दील किया जाता है. रिफाइनरी इंजीनियरों के लिए इसका कन्वर्जन रेट सबसे ज्यादा मुनाफा कमाता है.
सल्फर हटाने की प्रक्रिया
सल्फर हटाने की प्रक्रिया को 'हाइड्रोडिसल्फराइजेशन' कहा जाता है. इसमें 450 डिग्री सेल्सियस तक तापमान के साथ दबाव की जरुरत होती है. ईरानी तेल में सल्फर की मात्रा इतनी है कि इसे साफ करने के लिए महंगे औद्योगिक उपकरणों की जरूरत नहीं पड़ती है.
ईरानी तेल पर निर्भरता
इसी कारण भारत और चीन जैसे देशों की रिफाइनरियां, ईरानी तेल पर अपनी निर्भरता कम नहीं कर पातीं हैं.
अमेरिकी तेल
अमेरिकी तेल बहुत हल्का होता है. लेकिन यह बहुत अधिक 'नैफ्था' पैदा करता है. जिसके कारण यह डीजल व जेट फ्यूल कम देता है.