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बंगाल में हिंदू मसूर दाल को क्यों नहीं मानते शाकाहारी, क्या है महाभारत से इसका नाता?

Masoor Dal: बंगाली हिंदू परंपरा में मसूर दाल को नार्मल शाकाहारी भोजन नहीं माना जाता. एक पौराणिक कथा के अनुसार इसका संबंध महाभारत काल और दिव्य गौ कामधेनु के रक्त से जोड़ा जाता है. इसी कारण इसे कई धार्मिक अवसरों पर वर्जित माना गया.


By: sanskritij jaipuria | Last Updated: February 16, 2026 11:30:02 AM IST

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महाभारत काल से संबंध

बंगाली हिंदू परंपरा के अनुसार मसूर दाल (मुसुरीर दाल) को सामान्य दालों से अलग माना जाता है. ये मान्यता द्वापर युग, अर्थात महाभारत काल से जुड़ी हुई है. उस समय महर्षि जमदग्नि और उनकी पत्नी रेणुका के आश्रम में कामधेनु नामक दिव्य गौ रहती थीं, जो सभी इच्छाएं पूर्ण करने में सक्षम थीं.

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सहस्त्रबाहु अर्जुन की लालसा

एक बार सहस्त्रबाहु अर्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) महर्षि जमदग्नि के आश्रम में आए. उन्होंने कामधेनु की चमत्कारी शक्ति देखकर उसे पाने की इच्छा की. लोभ में आकर उन्होंने उसे बलपूर्वक ले जाने का प्रयास किया.

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कामधेनु पर आक्रमण

जब महर्षि जमदग्नि ने इसका विरोध किया, तो सहस्त्रबाहु अर्जुन क्रोधित हो उठे. उन्होंने दिव्य गौ कामधेनु पर बाणों से आक्रमण कर दिया, जिससे वो गंभीर रूप से घायल हो गईं और उनका रक्त पृथ्वी पर गिरा.

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मसूर दाल की उत्पत्ति की कथा

मान्यता है कि जहां-जहां कामधेनु का रक्त धरती पर गिरा, वहां लाल रंग की मसूर दाल के पौधे उग आए. इसी कारण इसे नार्मल आहार नहीं माना गया.

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निरामिष-ए-आमिष की धारणा

यद्यपि मसूर दाल पूरी तरह से वनस्पति आधारित है, फिर भी इसे “निरामिष-ए-आमिष” कहा जाता है- अर्थात दिखने में शाकाहारी, पर धार्मिक दृष्टि से मांसाहार के समान.

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लाल रंग का प्रतीकात्मक अर्थ

कच्ची मसूर दाल का गहरा लाल रंग रक्त से जोड़ा जाता है. इसी प्रतीकात्मक समानता के कारण इसे कई परंपराओं में अशुद्ध या त्याज्य माना गया.

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तामसिक आहार की कैटेगरी

आयुर्वेद और वैष्णव मान्यताओं के अनुसार मसूर दाल को तामसिक भोजन की कैटेगरी में रखा गया है. तामसिक आहार आलस्य, जड़ता या इंद्रिय प्रवृत्तियों को बढ़ाने वाला माना जाता है, जबकि पूजा-पाठ में सात्त्विक भोजन को ही सही समझा जाता है.

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पूजा संबंधी परंपराएं

पुराने बंगाली समाज में विधवाओं के लिए अत्यंत कठोर शाकाहारी नियम थे. मसूर दाल, प्याज, लहसुन आदि का सेवन वर्जित था. विशेष रूप से पूजा, व्रत या पवित्र अवसरों पर मसूर दाल से परहेज किया जाता था, क्योंकि इसे धार्मिक रूप से शुद्ध नहीं माना जाता था.