May 26, 2024
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Mahavir Jayanti 2023: भगवान महावीर ने दिए थे ये 5 सिद्धांत, जानिए उनका महत्व

  • WRITTEN BY: Apoorva Mohini
  • LAST UPDATED : April 4, 2023, 1:10 pm IST

नई दिल्ली। आज का दिन यानी 4 अप्रैल महावीर जयंती क रूप में मनाया जाता है जो कि जैन धर्म के चौंबीसवें (24वें) और आखिरी तीर्थंकर थे। जैनों के अनुसार तीर्थंकर वह व्यक्ति है जिसने तप के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया हो और जिसने अपनी सारी भावनाओं पर पूरा नियंत्रण पा लिया हो, जैन धर्म में 24 तीर्थंकर माने गए है। स्वामी महावीर ने लोगों को सत्य और अहिंसा का रास्ता दिखलाया था।

स्वामी महावीर के 5 सिद्धांत

स्वामी महावीर का मुख्य सिद्धांत तो अहिंसा ही था उनका मानना था कि किसी जीव के प्रति दया का भाव होना चाहिए तथा उनकी रक्षा करनी चाहिए। इसके भगवान महावीर के जो पांच सिद्धांत प्रचलति है वो सत्य,अहिंसा,अस्तेय या अचौर्य,अपरिग्रह,ब्रह्मचर्य है।

  • सत्य -सत्य के बारे में भगवान महावीर स्वामी कहते हैं, हे पुरुष! तू सत्य को ही सच्चा तत्व समझ। जो बुद्धिमान सत्य की ही आज्ञा में रहता है, वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है।

  • अहिंसा-इस लोक में जितने भी त्रस जीव (एक, दो, तीन, चार और पाँच इंद्रीयों वाले जीव) है उनकी हिंसा मत कर, उनको उनके पथ पर जाने से न रोको। उनके प्रति अपने मन में दया का भाव रखो। उनकी रक्षा करो। यही अहिंसा का संदेश भगवान महावीर अपने उपदेशों से हमें देते हैं।

  • अचौर्य – दुसरे के वस्तु बिना उसके दिए हुआ ग्रहण करना जैन ग्रंथों में चोरी कहा गया है।

  • अपरिग्रह – परिग्रह पर भगवान महावीर कहते हैं जो आदमी खुद सजीव या निर्जीव चीजों का संग्रह करता है, दूसरों से ऐसा संग्रह कराता है या दूसरों को ऐसा संग्रह करने की सम्मति देता है, उसको दुःखों से कभी छुटकारा नहीं मिल सकता। यही संदेश अपरिग्रह का माध्यम से भगवान महावीर दुनिया को देना चाहते हैं।

  • ब्रह्मचर्य– महावीर स्वामी ब्रह्मचर्य के बारे में अपने बहुत ही अमूल्य उपदेश देते हैं कि ब्रह्मचर्य उत्तम तपस्या, नियम, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, संयम और विनय की जड़ है। तपस्या में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तपस्या है। जो पुरुष स्त्रियों से संबंध नहीं रखते, वे मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ते हैं।

 

स्वामी महावीर का जीवन परिचय

भगवान महावीर अपने 12 वर्ष के कठोर तप के लिए जाने जाते हैं। इनका जन्म 599 बी सी में चैत्र शुक्ल तेरस के दिन, राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहां हुआ था। अपनी तपस्या के बाद स्वामी ने दिगंबर परंपरा स्वीकार ली थी जिसके चलते वे बाल ब्रह्मचारी थे लेकिन श्वेतांबर परम्परा के अनुसार और अपने माता-पिता के आदेशानुसार इन्हे यशोदा नामक सुकन्या से विवाह करना पड़ा। जैन धर्म के ग्रंथो में महावीर के और भी नामों का उल्लेख मिलता जो कि वर्धमान, वीर, अतिवीर, महावीर और सन्मति है।

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