नई दिल्ली. पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने देश के कुछ बड़े कारोबारियों के साथ जिस तरह से बैठकें की हैं और कारोबारियों ने जिस अंदाज में वजीरे आलम इमरान खान की आर्थिक नीतियों को लेकर उनके नजरिये पर बात रखी है उससे तख्ता पलट के लिए मशहूर पाकिस्तान में एक और तख्ता पलट की चर्चा जंगल में आग की तरह फैल गई है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की वित्तीय राजधानी कराची और रावलपिंडी स्थित सैन्य दफ्तरों में बड़े कारोबारियों के साथ जनरल बाजवा ने तीन हाई सिक्यॉरिटी मीटिंग्स की हैं. असल में पाकिस्तान इस वक्त भीषण आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहा है और इसका असर वहां की मिलिट्री पर भी साफ-साफ दिख रहा है. कहा जा रहा है कि पिछले एक दशक में ऐसा पहली बार हुआ है जब 2020 का रक्षा बजट फ्रीज कर दिया गया है. इस तरह के हालात तब हैं जब पाकिस्तानी सैनिक अफगानिस्तान के आतंकियों और भारत के साथ तनाव की वजहों से हाई अलर्ट पर है.

जनरल बाजवा की इस भूमिका को लेकर पाकिस्तान के कारोबारी जगत की बात करें तो कई बिजनस लीडर और आर्थिक विश्लेषक इसका स्वागत कर रहे हैं और कई इस बात को लेकर चिंतित भी हैं कि यह पाकिस्तान की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर चोट करने जैसा है. सिटीग्रुप इंक के पूर्व बैंकर यूसुफ नजर जो पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था पर एक किताब भी लिख चुके हैं का कहना है कि इसके दूरगामी असर होंगे.

हालांकि इसको लेकर पाकिस्तानी वित्त मंत्रालय में प्रवक्ता ओमर हामिद की भी प्रतिक्रिया आई है जिसमें उन्होंने कहा कि हम सेना की ओर से इकनॉमी को लेकर कोई प्रक्रियात्मक हस्तक्षेप नहीं देख रहे हैं। सेना अपना काम कर रही है और हम अपना काम कर रहे हैं. लेकिन बात इतनी ही नहीं है। दरअसल, जम्मू और कश्मीर से आर्टिकल 370 को खत्म कर भारत सरकार ने जो इतिहास रचा है और उसके बाद पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर भी जिस तरह से भारत बार-बार अपना दावा जता रहा है उससे वजीरे आलम इमरान खान की स्थिति लगातार कमजोर होती दिख रही है.

पाक सेना और आईएसआई को इस बात का अहसास हो गया है कि इमरान खान न तो देश के अंदर ठीक से काम कर पा रहे हैं और ना ही अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंच पर भी पाकिस्तान की बात को ठीक से रख पा रहे हैं. कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान की वैश्विक मंच पर जिस तरह से बेइज्जती हुई है, यहां तक कि इस्लामिक देशों ने भी जिस तरह से पाकिस्तान से मुंह फेर लिया है यह पाक सेना को विचलित कर रहा है. यह तो रही सेना की बात. इससे इतर यहां सत्ता के समानांतर आतंकवादी संगठनों की सत्ता चलती है वह भी इमरान खान से नाखुश दिख रही है.

जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर, लश्कर-ए-तैयबा चीफ हाफिज सईद समेत तमाम आतंकी संगठनों पर संयुक्त राष्ट्र ने जिस तरह से चाबुक चलाया है उससे इन संगठनों को लगने लगा है कि इमरान के रहते इनका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा. इसका अहसास पाक सेना और आईएसआई को भी है जो इसे प्रश्रय देता है. जाहिर सी बात है इमरान खान के खिलाफ अगर इतना सब कुछ चल रहा है तो तख्ता पलट की आहट सुनाई पड़ रही है तो इसमें किसी को अचरच नहीं होना चाहिए. यह जरूर होगा क्योंकि पाकिस्तान में इसका इतिहास पुराना है और इतिहास हमेशा खुद को दोहराता है, वक्त जो भी लगे.

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