नई दिल्ली. Iran USA Tension Timeline: ईरान और अमेरिका जंग के मुहाने पर आ खड़े हुए हैं. ईरान ने अमेरिकी सेना के ड्रोन को मार गिराने के बाद संदेश दे दिया है कि वो जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार है. वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चेतावनी भरे स्वर में कहा है कि ईरान ने बहुत बड़ी गलती कर दी. दोनों देशों के बीच तनाव का माहौल है. माना जा रहा है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच जंग होती है तो दुनिया के कई देशों पर तेल की कीमतों का गहरा प्रभाव पड़ेगा. अमेरिका और ईरान के बीच की खटास डोनाल्ड ट्रंप और हसन रुहानी के समय कही नहीं बल्कि पिछले काफी समय से चलती आ रही है. अमेरिका की बराक ओबामा सरकार में दोनों देशों ने परमाणु सौदा कर रिश्तों को मजबूत किया था लेकिन ट्रंप के आते ही इस फैसले को बदल दिया गया और दोनों देशों के बीच विवाद पैदा हो गया. आइए टाइमलाइन के जरिए जानते हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच क्या विवाद है और ईरान अमेरिका के बीच कब-कब तनाव की स्थिति पैदा हुई और संबंध खराब हुए.

1953 में अमेरिका और ब्रिटिश इंटेलिजेंस एजेंसियों में ईरान में मोसदेक का तख्तापलट
साल 1953 में अमेरिका और ब्रिटिश इंटेलिजेंस एजेंसियों की मदद से लोकतांत्रिक तरह से ईरान में तख्तापलट किया गया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेक को हटाकर अमेरिका से समर्थन प्राप्त मोहम्मद रजा पहलवी को गद्दी पर बैठा दिया गया. हालांकि कुछ ही समय में लोगों का विरोध शुरू हो गया और जनता सड़क पर उतर आई.

1979 में तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर हमला
ईरान के इतिहास में 1979 का साल काफी महत्वपूर्ण रहा. जनवरी में मोहम्मद मोसादेक को जनता के विरोध के चलते देश छोड़ना पड़ा. ईरान से देश निकाला झेल रहे इस्लामिक धर्मगुरू अयातुल्लाह खोमैनी वापस लौट गए और ईरान इसके बाद इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान बन गया. जिसके साथ 2500 साल से चल रही राजशाही भी खत्म हो गई. साल के अंत में चरमपंथियों ने तेहरान में स्थित अमेरिकन दूतावास पर कब्जा कर लिया और वहां मौजूद 52 अमेरिकी नागरिकों को को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा. उस समय जिमी कार्टर अमेरिका के राष्ट्रपति थी और चरमपंथियों की मांग थी कि अमेरिका ईरानी शाह को वापस भेजे. इसी साल ईरानी क्रांति की शुरुआत हुई.

1980 में इराक-ईरान युद्ध की शुरुआत
साल 1980 में इराक ने पड़ोसी देश ईरान पर हमला बोल दिया. उस समय अमेरिका ने भी इराकी शासक सद्दाम हुसैन का समर्थन किया. अमेरिका ने जंग के लिए इराक को हथियार भी मुहैया कराए थे. 8 सालों तक चले इस युद्ध में पांच लाख लोगों की जान गई.

1985 में ईरान कोंट्रा अफेयर का खुलासा
साल 1985 में रोनाल्ड रीगन अमेरिका के राष्ट्रपति थे. उनके कार्यकाल के दौरान ईरान कोंट्रा अफेयर सामने आया जिसमें खुलासा हुआ कि अमेरिका इराक के साथ-साथ ईरान को भी युद्ध के लिए हथियार सप्लाई कर रहा था. जानकारों ने इसका कारण लेबनान में बंधक अमेरिकियों को रिहाई बताया था. इस स्कैंडल के सामने आने के बाद इराक और अमेरिका के संबंध भी खराब होने लगे.

1988 अमेरिका का ईरान के खिलाफ ऑपरेशन प्रेयिंग मैंटिस
अमेरिका ने ईरान पर हमला करने के लिए 1988 में ऑपरेशन प्रेयिंग मैंटिस चलाया. यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका का सबसे बड़ा नौसेनिक ऑपरेशन था. अमेरिका ने इसके जरिए ईरान के तेल के कुओं को निशाना बनाया. अमेरिका चाहता था कि ईरान इराक से सीजफायर समझौता कर ले. इस ऑपरेशन से ईरान को काफी नुकसान हुआ और उसने अमेरिका के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अदालत में शिकायत भी की.

2003 में अमेरिका की ईरान की सीमा में घुसपैठ
साल 2003 में ईरान ने अमेरिका पर अपने देश की सीमा पर घुसपैठी का आरोप लगाया था. ईरान का कहना था कि अमेरिका ड्रोन और सैनिकों की मदद से ईरानी सीमा में घुसपैठ कर रहा है. ईरान में अमेरिकी सैन्य विमान मार गिराने का भी दावा किया.

अमेरिका का ईरान पर परमाणु हथियार बनाने का आरोप
2003 से अमेरिका ईरान पर परमाणु हथियार बनाने का आरोप लगाता रहा. अमेरिका का कहना था कि ईरान छुप-छुप कर परमाणु हथियार बनाने पर काम कर रहा है. 2006 में अमेरिकी और यूरोपियन प्रतिनिधियों ने दावा किया कि ईरान के पास 10 परमाणु हथियार बनाने जितना यूरेनियम मौजूद है.

ईरान को अमेरिका के हमला करने का डर
2006 में अमेरिका ने इरान फ्रीडम एंड सपोर्ट एक्ट पास किया. दोनों देशों के कुछ राजनेताओं ने इसे युद्ध की ओर कदम बढ़ाना बताया. इस एक्ट के जरिए अमेरिका ने ईरान में कई एनजीओ स्थापित किए, हालांकि इसमें कहीं जिक्र नहीं था कि अमेरिका ईरान में सेना की तैनाती करेगा. इससे ईरान को डर लगा कि कहीं अमेरिका उसके खिलाफ जंग न छेड़ दे.

2006 में अमेरिका का ईरानी बैंकों पर प्रतिबंध-
2006 में अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम के चलते ईरानी बैंकों पर प्रतिबंध लगा दिया, जिससे ईरान और अमेरिका के बीच प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष वित्तीय लेनदेन बंद हो गया. अमेरिका का दावा था कि ईरान इराक में शिया चरमपंथियों को वित्तीय सहायता दे रहा है.

2007 में अमेरिका की ईरानी काउंसलेट जनरल पर रेड
अमेरिका ने 2007 में ईरान के इराक में स्थित काउंसलेट जनरल के कार्यालय में रेड डाल दी और पांच कर्मचारियों को गिरफ्तार कर दिया. रूस ने इस रेड का विरोध किया और अमेरिका पर विएना संधि तोड़ने का आरोप लगाया. उस समय जॉर्ज डब्लू बुश अमेरिका के राष्ट्रपति थे. इस बीच अमेरिका और ईरान के मध्य काफी तनाव हुआ.

2008 में ईरान अमेरिका के बीच समुद्री सीमा पर तनाव
साल 2008 की शुरुआत में अमेरिका ने ईरान पर होरमुज जलसंधि में अमेरिकी जहाजों के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया. हालांकि ईरान ने इस आरोप से पल्ला झाड़ दिया. इसके बाद 2009 में बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने और अमेरिका ईरान के बीच संबंध सुधारने में पहल की. हालांकि इस बीच कई ऐसे छोटे-छोटे घटनाक्रम हुए जिससे अमेरिका और ईरान के बीच तनाव पैदा हुआ और दोनों देशों के बीच खींचतान चलती रही.

2015 ईरान परमाणु समझौता
ईरान ने जुलाई 2015 में विएना समझौते के अंतर्गत ईरान परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते में तय हुआ कि ईरान को अपने यूरेनियम भंडार का करीब 98 फीसदी हिस्सा नष्ट करना होगा. इसके बदले में ईरान को पश्चिमी देशों द्वारा लगाए प्रतिबंधों में ढील दी गई.

डोनाल्ड ट्रंप शासन में ईरान अमेरिका के बीच फिर बढ़ा तनाव
जनवरी 2017 में अमेरिका ने इरानी नागरिकों के यूएस में प्रवेश पर अस्थायी रोक लगा दी. इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2018 में ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध फिर से लागू कर दिए. ईरान के राष्ट्रपति राष्ट्रपति हसन रोमानी ने भी विरोध में कहा कि वह होर्मुज जलसंधि अमेरिका के लिए बंद कर देंगे. 2018 में ईरान ने यूएस के साथ सीधी बातचीत पर प्रतिबंध लगा दिया. 2019 की शुरुआत में अमेरिका ने दूसरे देशों को ईरान से तेल नहीं खरीदने की धमकी दी. इससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर काफी असर पड़ा. अब हालात यह हो चुके हैं कि दोनों देश एक दूसरे को युद्ध की धमकी दे रहे हैं.

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