Home > विदेश > ट्रंप की एक चाल और भारत की बड़ी जीत! चीन के गढ़ में घुसकर कमाएगा अरबों डॉलर

ट्रंप की एक चाल और भारत की बड़ी जीत! चीन के गढ़ में घुसकर कमाएगा अरबों डॉलर

India on South China Sea: विश्लेषकों का मानना है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की प्राथमिकताओं में बदलाव के कारण कई दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने नए साझेदारों की तलाश शुरू की.

By: Shubahm Srivastava | Published: June 3, 2026 9:34:20 PM IST



India Brahmos Missile Deal: साउथ चाइना सी लंबे समय से वैश्विक शक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बना हुआ है. इस क्षेत्र में चीन अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में भारत ने भी अपनी मौजूदगी मजबूत कर ली है.

रक्षा सहयोग, हथियार निर्यात और कूटनीतिक साझेदारियों के जरिए भारत ने इस क्षेत्र में अपनी भूमिका को पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली बनाया है. इससे भारत को आर्थिक और सामरिक दोनों स्तरों पर फायदा मिलने की उम्मीद है.

अमेरिकी रणनीति में बदलाव से बना नया अवसर

विश्लेषकों का मानना है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की प्राथमिकताओं में बदलाव के कारण कई दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने नए साझेदारों की तलाश शुरू की. चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए इन देशों ने भारत के साथ रक्षा संबंधों को मजबूत करने में रुचि दिखाई. भारत ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए रक्षा उपकरण, मिसाइल सिस्टम, ड्रोन और निगरानी तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया है.

ब्रह्मोस मिसाइल बनी भारत की बड़ी ताकत

भारत की रक्षा कूटनीति के केंद्र में ब्रह्मोस मिसाइल है, जिसे दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिना जाता है. फिलीपींस को ब्रह्मोस की सफल आपूर्ति के बाद भारत ने वियतनाम के साथ भी बड़े रक्षा समझौते की दिशा में प्रगति की है. इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों ने भी इस मिसाइल प्रणाली में रुचि दिखाई है. इन सौदों से भारत का रक्षा निर्यात तेजी से बढ़ रहा है और क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर भी असर पड़ रहा है.

दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को क्यों पसंद आ रहा भारत?

भारत खुद को एक भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहा है. जहां कई देशों को हथियार बिक्री के साथ राजनीतिक शर्तों और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है, वहीं भारत प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग, रखरखाव और लॉजिस्टिक सहायता पर भी जोर देता है. यही वजह है कि कई देश भारत के साथ दीर्घकालिक रक्षा सहयोग को प्राथमिकता दे रहे हैं. इससे उनके सैन्य ढांचे को मजबूत करने में भी मदद मिल रही है.

‘एक्ट ईस्ट’ नीति को मिला नया आयाम

भारत की बढ़ती रक्षा भागीदारी उसकी ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ को भी नई मजबूती दे रही है. दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ रक्षा और सुरक्षा संबंध मजबूत कर भारत क्षेत्रीय संतुलन में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है. इससे न केवल रणनीतिक साझेदारियां मजबूत हो रही हैं, बल्कि समुद्री सुरक्षा, खुफिया सहयोग और संयुक्त सैन्य अभ्यासों के अवसर भी बढ़ रहे हैं.

आर्थिक और सामरिक लाभ दोनों

साउथ चाइना सी में बढ़ती सक्रियता भारत के लिए दोहरा लाभ लेकर आ रही है. एक ओर रक्षा निर्यात से अरबों डॉलर के नए अवसर पैदा हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत की वैश्विक सुरक्षा प्रदाता की छवि भी मजबूत हो रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रणनीति सफल रहती है, तो भारत आने वाले वर्षों में रक्षा उत्पादन और सैन्य कूटनीति के क्षेत्र में दुनिया की प्रमुख शक्तियों में शामिल हो सकता है.

US Tariff: भारत समेत 60 देशों पर क्यों एक्स्ट्रा टैक्स लगाने जा रहा है अमेरिका? ये है बड़ी वजह

Advertisement