Gurudwara Nankana Sahib Mob Attack And Anti CAA Protest: पाकिस्तान के ननकाना शहर में सिखों के पवित्र ननकाना साहिब गुरुद्वारा पर शुक्रवार को स्थानीय लोगों की एक उग्र भीड़ ने हमला कर दिया. प्रदर्शनकारियों की अगुवाई गुरुद्वारे के ग्रंथी की बेटी जगजीत कौर का जबरन धर्मांतरण कर निकाह रचाने वाले हसन का परिवार कर रहा था. प्रदर्शनकारियों ने गुरुद्वारे पर पत्थर फेंके. प्रदर्शन कर रही कट्टरपंथी भीड़ में लोग नारे लगा रहे थे कि एक भी सिख ननकाना साहिब में नहीं रहेगा, वो गुरुद्वारे को तोड़कर शहर का नाम गुलाम ए मुस्तफा करने की मांग कर रहे थे.

भारत द्वारा इस घटना पर पाकिस्तान से कार्रवाई की मांग के बाद पाकिस्तानी पंजाब के एक मंत्री का फोन गया तब कहीं जाकर स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची. इसके बाद गुरुद्वारे में फंसे श्रद्धालु बाहर निकल पाए. हालांकि प्रदर्शनकारियों ने इसके बाद पुलिस थाने के सामने नारेबाजी शुरू कर दी. आखिरकार पुलिस ने हिरासत में लिए पत्थरबाजों को छोड़ा तब कहीं जाकर यह मामला थमा. ननकाना साहिब में तनाव बना हुआ है.

ठीक इसी वक्त सरहद के इस पार भारत में क्या हो रहा है. भारत में नागरिता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में विरोध-प्रदर्शन लगातार जारी हैं. दूसरी तरफ सरकार अब इसके समर्थन में भी रैली और मार्च आयोजित करवा रही है. इस कानून में यह कहा गया है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई, पारसी धार्मिक रूप से प्रताड़ित वर्ग के लोगों को भारत में नागरिकता आसानी से मिल सकेगी अगर वो 2014 से पहले भारत आ चुके हों. प्रदर्शनकारी कह रहे हैं कि इसमें मुसलमानों का नाम क्यों नहीं है?

जी हां! पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफागनिस्तान में गैर मुसलमानों पर हुए हैं अत्याचार

 लेकिन सवाल यह है कि इन देशों में धार्मिक तौर पर कौन प्रताड़ित हो रहा है. ननकाना साहिब में गुरुद्वारे के ग्रंथी की नाबालिग बेटी जगजीत कौर का अपहरण, जबरन धर्मांतरण और फिर निकाह किस मुल्क में हुआ और कौन कर रहा है. मजहब के नाम पर बने इन मुल्कों में मजहबी आधार पर हिंसा और भेदभाव कोई अस्वाभाविक बात या कपोल कल्पना नहीं है. पाकिस्तान में पिछले 70 सालों में कैसे अल्पसंख्यकों की संख्या इतनी तेजी से गिरती गई. बांग्लादेश में किन के खिलाफ सांप्रदायिक दंगे होते हैं. अफगानिस्तान जो बुद्धिज्म का सबसे बड़ा केंद्र था वहां बुद्ध की मूर्तियों तक के साथ क्या हुआ. 

हरभजन सिंह ने की पाकिस्तानी PM इमरान खान से अपील- कुछ तो करो!

नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वाले भटक गए हैं!

देश में इस वक्त भाजपा की अगुवाई में सरकार चल रही है. नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं, अमित शाह हैं गृह मंत्री. यह एक दक्षिणपंथी विचारधारा की पार्टी है. हिंदू वोटर भाजपा का कोर वोटर है. बीजेपी की राजनीति में मंदिर, धर्म, धारा 370, सामान्य नागरिक संहिता ये सारी चीजें रही हैं. इसमें कुछ भी छुपा हुआ तथ्य नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे मुस्लिमोें को लगातार वोट बैंक बनाए रखने की राजनीति इस देश में होती आई है. नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वाले इस बात की नैतिक दुहाई दे रहे हैं कि भारत के सेकुलर छवि को इस कानून से धक्का लगेगा. 

क्या नागरिकता संशोधन कानून के बाद भारत सेकुलर नहीं रह गया?

भारत में कई धर्म, सैकड़ों जातियां, उप जातियां, संप्रदाय, परंपराएं, कबीले हैं. भारत की इस विविधता को संविधान ने भी पूरी तव्ज्जो दी है. हाशिये पर खड़े वर्ग के लिए विशेष नियम बनाए गए. बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने जब भारत का संविधान बनाया तो वह भी चाहते तो अपनी बौद्धिक अंहकार की तुष्टि करते. विदेशों से शिक्षा प्राप्त अंबेडकर को यह भी ध्यान था कि देश की आजादी के साथ दलित समुदाय आजाद नहीं हुआ है, हाशिए पर पड़े कमजोर वर्गों के लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ेगी. इसलिए आरक्षण की व्यवस्था की गई. 

क्या मुस्लिमों के लिए जामिया और सिखों के लिए खालसा यूनिवर्सिटी खुलने से भारत सेकुलर नहीं रहा?

ठीक इसी तरह आजादी के बाद नेहरू-लियाकत पैक्ट में भी दोनों देशों ने अपने अल्पसंख्यकों की देख-रेख की जिम्मेदारी का करार किया था. भारत में दिल्ली में ही धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसी यूनिवर्सिटी है तो सिख समुदाय के लिए खालसा कॉलेज भी हैं जहां इन धर्मों के लोगों को आरक्षण प्राप्त होता है. तो क्या यह धार्मिक भेदभाव है? क्या इससे भारत सेकुलर देश नहीं रह गया? ठीक इसी तरह पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक अत्याचार हुए हैं. इन अत्याचारों का नेतृत्व यहां के बहुसंख्यक मुसलमानों ने किया है. इस तथ्य को आंकड़े साबित करते हैं.

शौकिया आंदोलनकारियों के चक्कर में आम मुसलमान अधर में!

ऐसे में सिर्फ हवा-हवाई बातें या बौद्धिक जुगाली से आपकी आंदोलन की तलब तो पूरी हो सकती है लेकिन इससे एक पूरा समुदाय डर और आशंका के साये में जीने लगता है. मुसलमानों के बड़े तबके में अगर यह डर पैदा हो गया कि उनको सरकार इस देश से निकालने के लिए कानून लेकर आने वाली है तो यह नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे पढ़े-लिखे, खाए-अघाए आंदोलनकारियों की नैतिक हार है. गांधी के देश में जहां विरोध के हिंसक होने पर असहयोग आंदोलन तक वापस ले लिया गया था, यहां बसें जलाने को विरोध समझा जाने लगा है. 

अगर भारत के प्रधानमंत्री की बात पर भरोसा नहीं तो किसकी बात मानें?

एनआरसी पर अगर देश के प्रधानमंत्री की बात को भी झूठा साबित करने की होड़ लग जाए तो देश चलेगा कैसे? विरोध-प्रदर्शन के बाद अगर देश का प्रधानमंत्री आकर देश को आश्वस्त करे कि एनआरसी पर सरकार सोच भी नहीं रही तो यकीन करने के अलावा क्या विकल्प है? आंदोलनकारियों को चाहिए था कि इसे अपनी जीत समझें और आंदोलन को शांतिपूर्ण तरीके समेटे.  2024 तक नरेंद्र मोदी इस देश के प्रधानमंत्री हैं, ऐसे में हमें भारत के प्रधानमंत्री की बात पर तो यकीन करना पड़ेगा. वरना इतने बड़े मुल्क में चीजें चलेंगी कैसे?

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