नई दिल्ली: आइसलैंड में 80 से 90 के दशक के बीच एक ऐसा आया जब वहां की लगभग आधी युवा आबादी को शराब और ड्रग्स की लत लग गई थी. आइसलैंड की सरकार के सामने पूरी की पूरी नस्ल को बचाने की चुनौती थी जिसके लिए सरकार ने कमर कसी और आज वहां की सिर्फ पांच फीसदी युवा ही ऐसी बची है जो ड्रग्स की आदी है. बाकी युवा शराब और ड्रग्स के नशे से बाहर आ चुके हैं.

आइसलैंड ने जिस तरीके से युवाओं को नशे से निजाद दिलाया है वो बाकी देशों के लिए नजीर है. आइसलैंड में नशे की समस्या से निपटने के लिए एक प्लान बनाया जाता है. इसके बाद उस युवा के माता-पिता के साथ-साथ उसके स्कूल में भी बात की जाती है. इस प्लान के तहत 16 साल के बच्चे को रात दस बजे के बाद घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगाई जाती है. बच्चों पर नजर रखने के लिए कई बार माता-पिता भी सड़कों पर गश्त लगाते हैं. स्कूल और परिवारवालों ने साथ मिलकर ये तय किया कि बच्चों को नशे से दूर रखना है. इसके लिए परिवार के लोगों ने बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताने का फैसला किया.

नशे के आदी बच्चों के माता-पिता शाम चार बजे तक घर पहुंचने की कोशिश करते हैं. सरकार ने उन अभिभावकों को कुछ पैसे भी दिए जिससे वो अपने बच्चों को ऐक्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी में डाल सकें. युवाओं की हालत का साल में एक बार सर्वे किया जाता है. परिवार से सर्वे पर बात की जाती है. युवाओं को सुधारने का आइसलैंड मॉडल अब सुधार का मॉडल बन गया है जिसे यूरोप के 35 शहर अपना रहे हैं.

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