
समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को पीकर शिव का कंठ नीला हो गया था और शरीर में उसकी उष्णता (गर्मी) बढ़ गई थी
शिव भक्त रावण ने पवित्र गंगाजल लाकर उनका जलाभिषेक किया जिससे उन्हें शीतलता मिली
त्राता युग में परशुराम ने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर 'पूरा महादेव' में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था
श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा कराई और हरिद्वार में गंगा स्नान कराया था. इसे पितृ-भक्ति और सेवा का प्रतीक माना जाता है
कंधे पर कांवड़ रखकर पैदल चलना और हर कदम पर शिव का नाम जपना भक्त की अटूट निष्ठा और शारीरिक-मानसिक तपस्या का प्रतीक है
कुछ शिव भक्त डाक कांवड लाते हैं जहां यात्रा में जल को रुकने नहीं दिया जाता और लगातार दौड़ते हुए शिवालय तक पहुंचाते हैं
कांवड़ उठाने के लिए अनुशासन, शुद्धता और संयम का पालन करना जरूरी होता है