Home > उत्तर प्रदेश > इस गैंग का नाम सुनकर, थर-थर कांपते थे कैब ड्राइवर; किराए पर टैक्सी बुक करके… नेपाल तक फैला था अपराध का काला धंधा!

इस गैंग का नाम सुनकर, थर-थर कांपते थे कैब ड्राइवर; किराए पर टैक्सी बुक करके… नेपाल तक फैला था अपराध का काला धंधा!

बरेली के कुछ दोस्तों का यह गिरोह टैक्सी किराए पर लेकर बेगुनाह ड्राइवरों को उत्तराखंड की पहाड़ियों में ले जाते थे और वहां उनकी हत्या करके कार को नेपाल में बेच देते थे. इस गैंग के खिलाफ सबसे पहले 2001 में केस दर्ज हुआ था लेकिन मुख्य आरोपी 25 साल तक फरार रहा. जानिए आखिर क्या है पूरा मामला और कैसे गैंग के अपराधी भोले-भाले टैक्सी ड्राइवर्स को अपने जाल में फंसाकर खाई में फेंक देते थे.

By: Kajal Jain | Published: August 13, 2026 3:32:45 PM IST



किराए पर टैक्सी की बुकिंग. ड्राइवर की हत्या. शव को ठिकाने लगाना और कैब नेपाल में बेचना. 1999 से 2001 के बीच एक्टिव बरेली की सीरियल किलर गैंग का यही काम था. उन्होंने दिल्ली-जयपुर राजमार्ग पर सिलसिलेवार हत्याओं को अंजाम दिया. फिर अगले 4 साल तक किराए पर टैक्सी बुक करके उत्तराखंड की सुनसान पहाड़ी इलाकों में जुर्म की नई दास्तां लिखते रहे. कई बेगुनाह कैब ड्राइवर्स की जान ली. इस गिरोह के 2 सदस्य धीरेन्द्र तोमर और दिलीप नेगी तो शुरू में ही पकड़े गए लेकिन अन्य 3 सरगना- धीरज तोमर, धीरेन्द्र का भाई, और अजय लांबा लगभग 25 साल तक पुलिस की आंखों में घूल झोंकते रहे. पहले पकड़ा गया धीरेन्द्र 2011 में पैरोल तोड़कर फरार हो गया था. हालांकि, 2025 में दिल्ली पुलिस तीनों गिरोह सदस्यों को सलाखों के पीछे पहुंचाने में कामयाब रही. फरार चल रहे धीरज को भी 2025 में गिरफ्तार कर लिया गया. देखते ही देखते, मुख्य आरोपी अजय लांबा उर्फ बंशी का भी भंडाफोड़ हुआ और उसे पकड़कर 5 जुलाई 2025 को  कोर्ट में पेश किया गया. 

कैसे रची जाती थी खौफनाक साजिश? 

पुलिस की जांच में खुलासा हुआ कि उस दौर में कैब एग्रीगेटर सेवाएं नहीं होती थीं इसलिए गिरोह के लिए अपराध को अंजान देना भी आसान हो गया था. मुख्य आरोपी बंसी ने अपने गैंग के साथ मिलकर अलग-अलग टैक्सी स्टैंडों पर जाता और भोले-भाले ड्राइवर्स को अपना शिकार बनाता था. वे किसी बहाने टैक्सी बुक करते थे, रास्ते में ड्राइवर को नशीली चीजें या पानी में मिलाकर कुछ खिला देते थे और फिर बेरहमी से उनके गले घोंटकर उनकी जान ले लेते थे. इसके बाद शवों को पहाड़ों से नीचे या नालों में फेंक दिया जाता था और उनकी टैक्सियों को नेपाल ले जाकर बेच दिया जाता था. इस गिरोह में धीरज और धिराज सिंह तोमर के अलावा दिलीप नेगी जैसे अन्य अपराधी भी शामिल थे. इनमें से कुछ को पहले ही सजा हो चुकी थी, लेकिन बंसी अपनी चालाकी से हमेशा बच निकलता था.

नाम बदलकर नेपाल और देहरादून में बिताई जिंदगी

महज छठी कक्षा तक पढ़ाई करने वाला बंसी अपनी कम उम्र से ही अपराध की दुनिया में उतर चुका था और उस पर चोरी, डकैती व आर्म्स एक्ट के कई मामले दर्ज थे, साल 1996 में वह अपनी पहचान बदलकर ‘अजय लांबा’ बन गया और उत्तर प्रदेश के बरेली में रेलवे स्टेशन के पास ठेले पर कपड़े बेचने लगा. यहीं उसकी मुलाकात बाकी गैंग के सदस्यों से हुई थी. साल 2001 में जयपुर से बुक की गई एक टैक्सी के ड्राइवर की हत्या के बाद जब पोल खुली, तो गैंग के सदस्य भागे-भागे फिरने लगे. साल 2008 में बंसी नेपाल भाग गया और वहां शादी कर ली. इसके बाद 2018 में वह वापस भारत लौटा और देहरादून में रहने लगा. इस दौरान उसने नेपाल से चोरी गाड़ियों को पूर्वोत्तर भारत में बेचने के अलावा ओडिशा से गांजा तस्करी का धंधा भी शुरू कर दिया, जिसके चलते वह पहले भी जेल जा चुका था.

ऐसे खुला 25 साल पुराना राज और धरा गया शातिर अपराधी

दिल्ली पुलिस लंबे समय से इस पहेली को सुलझाने में जुटी थी कि आखिर ‘अजय लांबा’ असल में कौन है. पुलिस रिकॉर्ड में जहां वह विकासपुरी थाने का ‘बैड कैरेक्टर’ (BC) बंसी था, वहीं अन्य मामलों में उसे अजय लांबा के नाम से जाना जाता था, जिससे पुलिस दोनों छोर नहीं जोड़ पा रही थी. हत्या के मामले बहुत पुराने थे और उस समय ऑनलाइन रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं थे जैसे आजकल हैं. जब पुलिस ने पैरोल कूदकर फरार हुए उसके एक साथी से पूछताछ की, तो बंसी के छिपने के ठिकाने और उसकी असली पहचान की कड़ियां आपस में जुड़ने लगीं. पुलिस ने उसके देहरादून और ओडिशा के ठिकानों पर नजर रखनी शुरू की. आखिरकार, जब 2025 में, वह दिल्ली की अदालत में एक मामले की सुनवाई के लिए पेश होने आया, तो क्राइम ब्रांच की टीम ने जाल बिछाकर उसे आखिरकार दबोच ही लिया और इस तरह 25 साल पुराने खौफनाक वारदातों का अंत किया.

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