New Delhi : नई दिल्ली

Savitribai phule,आज महात्मा ज्योतिबा फुले व उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ( Savitribai phule ) को आधुनिक भारतीय सामाजिक क्रांति का जनक कहा जा सकता है। फुले दंपत्ति ने पूरी जिंदगी भारतीय समाज में मौजूदा वर्ग भेद,जाति भेद,धर्म भेद व छुआछूत के खिलाफ संघर्ष किया । सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी1831 में महाराष्ट्र के गांव नायगांव खंडाला जिला सतारा में हुआ। इनके पिता का नाम खंडो जी नेवसे एवं माता का नाम लक्ष्मी था।

परिजनों ने की 9 वर्ष की उम्र में शादी

मात्र 9 वर्ष की आयु में सावित्री बाई फुले ( Savitribai phule ) का विवाह 1840 में समाज सुधारक ज्योतिबा फुले के साथ कर दिया गया। उस समय जोतिबा की उम्र 13 वर्ष थी । ज्योतिबा फुले ने स्त्री शिक्षा के महत्व को देखते हुए बालिका शिक्षा शुरू करने की गर्ज से 1841 में सावित्री को पढ़ाना शुरू किया । 1846-47 में सावित्रीबाई फुले ने नॉर्मल स्कूल से तीसरी व चौथी दर्जे की पढ़ाई की। 

बालिकाओं को शिक्षा के दरवाज़े खोले और अंधविश्वास को खत्म किया

बालिकाओं को लेकर शिक्षा में बढ़ते अंधविश्वास को खत्म करने के लिए  1 जनवरी 1848 को लड़कियों के लिए बुधवार पेठ पुणे में स्कूल खोला गया। जिसमें पहले ही दिन 6 लड़कियों ने प्रवेश लिया रूढ़िवादियों द्वारा प्रचार किया जा रहा था कि जो औरत पढ़ेगी उसका पति मर जाएगा। उन्होंने इसका जवाब शिक्षित होने के बाद दिया तब सावित्री ने कहा देखो मैं पढ़ी हूं मेरा पति मरा नहीं, यह पूरी बकवास है।

शिक्षा के लिए निचली जाति की लड़कियों को सामाजिक विरोध

इसके बाद उन्होंने पुणे व उसके आसपास 18 विद्यालय लड़कियों के लिए खोलें । इन स्कूलों में अछूत कहे जाने वाली मांग,महार जातियों के लिए दरवाजे खोले गए। उस समय लड़कियों और अछूतों के लिए शिक्षा के काम का रूढ़िवादी समाज द्वारा भारी विरोध किया गया।

सावित्री पर फैंकी जाती थी गन्दगी

सावित्रीबाई फुले जब स्कूल के लिए निकलती तो उन पर गोबर,कीचड़ ,पत्थर फेंके जाते । इस कारण वह अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी लेकर जाती थी स्कूल पहुंचकर गोबर,कीचड़ से भरी साड़ी के स्थान पर दूसरी साड़ी पहन लेती थी । सावित्री कहती थी मेरे भाइयों मुझे प्रोत्साहन देने के लिए आप मुझ पर पत्थर नहीं फूलों की वर्षा कर रहे हैं । तुम्हारी इस करतूत से मुझे यही सबक मिलता है कि मैं निरंतर अपनी बहनों की सेवा में लगी रहूं ।ईश्वर तुम्हें सुखी रखे। इस काम में उनके साथ उसकी सहयोगी फातिमा शेख भी थी ।

अंग्रेजी हुकूमत ने किया सम्मानित, मिला सर्वश्रेष्ठ अध्यापिका का पुरस्कार

1849 में बड़ी उम्र की महिलाओं के लिए भी स्कूल खोले गए ।16 नवंबर 1852 को पूरे परिवार को अंग्रेज सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया। सावित्री बाई फुले को सर्वश्रेष्ठ शिक्षक घोषित किया गया ।सावित्रीबाई फुले ने काव्यों की रचना भी की । इसमें एक कविता का अंश “जन्म लेकर नारी की कोख से अगर तो उसकी ही निंदा करेगा ” ऐठने चाहिए कान तेरे उसी मां को ही बाकी है सब बेकार की बातें ”

महिलाओं के लिए प्रसूति गृह का निर्माण

1863 में फुले दंपत्ति ने अपने मकान में विधवाओं के लिए प्रसुति ग्रह खोला । इस बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की सूचना के लिए पुणे में जगह-जगह पोस्टर लगाए गए। विधवाएं यहां आकर बिना किसी बाधा के अपना बच्चा पैदा कर सकती हैं और अपना बच्चा साथ ले जाए या यही रखें ।

छूत-अछूत की भावना के खिलाफ उठाई आवाज़,गोद लिए बेटे के साथ खोले अकाल में भोजनालय

रूढ़ि- वादियों के विरोध के बावजूद 1868 में फुले ने अछूतों के लिए अपना कुआं खोल दिया । क्योंकि अछूतों को अपने कुओं पर चढ़ने नहीं दिया जाता था और ना ही अपना कुआं खोदने की इजाजत थी। 1876 में ब्राह्मण विधवा काशीबाई के पुत्र को गोद लिया और उसका नाम जसवंत रखा। उसे पढ़ा लिखा कर डॉक्टर बनाया। जसवंत फौज में भर्ती हो गया । 1876-77 में महाराष्ट्र में अकाल पड़ा । पूरे परिवार ने अकाल पीड़ितों के लिए 52 मुफ्त भोजनालय खुले ।

प्लेग की महामारी में ज्योति फुले की मृत्यु

28 नवंबर 1890 में ज्योति फुले की मृत्यु हो गई । रूढ़िवादियो ने उनके दत्तक पुत्र से अंतिम क्रिया नहीं करने दी। जिसके चलते सावित्रीबाई फुले ने ही अपने पति की सभी अंतिम क्रिया पूरी की । फुले की मृत्यु के बाद अपने पति द्वारा गठित सत्यशोधक समाज की अध्यक्ष बनी । 1897 में पुणे में प्लेग की महामारी चल पड़ी । लोग धड़ाधड़ मरने लगे । सावित्रीबाई प्लेग से पीड़ित लोगों की सेवा व इलाज में जुट गई ।

मरीजों की सेवा करते हुए सावित्रीबाई फुले की मृत्यु

अछूतों समेत लोगों की सेवा करने लगी और खुद भी प्लेग की चपेट में आ गई। जिनके चलते 10 मार्च 1897 को उनकी मृत्यु हो गई । सावित्रीबाई फुले ने मानव सेवा के लिए अपना जीवन जिया। 1905 में पुणे में फिर से प्लेग फैल गया । अपने माता की तरह लोगों का इलाज करने के लिए नोकरी छोड़ कर जसवंत लौट आए और मरीजों की सेवा करते हुए 1905 में उनका भी निधन हो गया ।

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