नई दिल्ली: केंद्रीय विद्यालय में हर सुबह होने वाली प्रार्थना पर 50 साल बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया गया है कि रोजाना होने वाली प्रार्थना एक धर्म की मान्यताओं को बढ़ावा देती है. ‘बहा दो प्रेम की गंगा दिलों में प्रेम का सागर, हमें आपस में मिल जुलकर प्रभु रहना सिखा देना’ ऐसी ही कई सीख देने वाली लाइनें इस प्रार्थना में हैं जिसे 50 साल से केंद्रीय विद्यालय के छात्र करते चले आ रहे हैं. लेकिन पांच दशक बाद इस पर धार्मिक मान्यता को बढ़ावा देने का आरोप लगा है.

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के सिंगरौली के एक वकील विनायक शाह की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय विद्यालय संगठन और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि रोजाना सुबह स्कूल में होने वाली इस हिंदी और संस्कृत की प्रार्थना से क्या किसी धार्मिक मान्यता को बढ़ावा मिल रहा है? इसकी जगह कोई सर्वमान्य प्रार्थना क्यों नहीं कराई जा सकती? इन तमाम सवालों के जवाब कोर्ट ने 4 हफ़्ते में तलब किये हैं.

याचिका दायर करने वाले विनायक शाह के बच्चे केंद्रीय विद्यालय से पढ़ाई पूरी कर चुके हैं. विनायक शाह ने कोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा है कि ये प्रार्थना छात्रों में वैज्ञानिक सोच पैदा करने की राह का रोड़ा है. इसमें भगवान और धर्म को बहुत ज्यादा महत्व दिया गया है और वो छात्रों की सोच में अपनी जगह बना लेते हैं. उनका ये भी कहना है कि इसे अल्पसंख्यक समुदायों और नास्तिकों पर थोपा जा रहा है जिसकी इजाजत संविधान नहीं देता. याचिका में आगे कहा गया है कि संविधान की धारा 28(1) के मुताबिक सरकारी फंड से चलने वाले शैक्षणिक संस्थानों को कोई भी धार्मिक निर्देश नहीं दिए जा सकते हैं. जबकि कॉमन प्रेयर धारा 28 के मुताबिक धार्मिक निर्देश हैं.

इस दलील के साथ ही जनहित याचिका में ये अपील की गई कि केंद्र और केंद्रीय विद्यालय को निर्देश जारी किए जाएं ताकि वो सुबह की एसेंबली या किसी दूसरे मौके पर इस प्रार्थना को कराना बंद कर दें और इसकी जगह छात्रों में वैज्ञानिक शिक्षण को बढ़ावा दें. वीडियो में देखें पूरा शो…

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