नई दिल्ली: ऐसा लगता है कि इन दिनों देश में बाबाओं के बुरे दिन चल रहे हैं. पहले आसाराम फिर राम रहीम और अब इन दिनों जो सबसे बड़ा नाम विवादों में है वो है सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां. जी हां वही राधे मां जो खुद को भगवान का अवतार बताती हैं. इंडिया न्यूज/इनखबर ने राधे मां से उनके ऊपर चल रहे विवादों पर खुलकर बात की और सुखविंदर कौर से राधे मां बनने की कहानी बताई. सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां का जन्म पंजाब के गुरदासपुर स्थित दोरांगला गांव में 4 अप्रैल 1965 को हुआ. सुखविंदर कौर के पिता सरदार अजीत सिंह पंजाब के बिजली विभाग में काम करते थे. 18 साल की उम्र में राधे मां की शादी मुकेरिया के मनमोहन सिंह से हुई लेकिन बाद में गुरविंदर कौर के पति नौकरी के लिए दोहा की राजधानी कतर चले गए.
 
शादी के बाद आर्थिक तंगी की वजह से सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां ने लोगों के कपड़े सिलकर गुजारा किया. 21 साल की उम्र में सुखविंदर कौर महंत रामाधीन परमहंस की शरण में पहुंचीं. महंत परमहंस ने सुखविंदर कौर को 6 महीने तक दीक्षा दी और नाम दिया राधे मां. धीरे-धीरे राधे मां के पंजाब के कई जिलों में भक्त बन गए. देवी पर विवाद के बाद राधे मां 2002 में दिल्ली आ गई. दिल्ली में कुछ दिनों तक रहने के बाद वो मुंबई चली गई. 
 
हाथ में त्रिशूल क्यों रखती है सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां?
इस सवाल के जवाब में सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां ने कहा कि ये त्रिशूल धर्म का प्रतीक है और मैं धार्मिक महिला हूं. उन्होंने कहा कि मैं खाली हाथ चलूंगी तो लोगों को कैसे पता चलेगा कि मैं कौन हूं. ये त्रिशूल मेरी पहचान है कि मैं धार्मिक महिला हूं. ये त्रिशूल लकड़ी का है.
 
किस देवी-देवता की पूजा करती है राधे मां?
बचपन में मैं गुरुनानक देव जी के गुरुद्वारे जाते थी और काली माता के मंदिर जाती थी. भगवान शंकर की पूजा करती हूं और दुर्गा माता को अपनी मां मानती हूं. भगवान शिव को अपना इष्ट मानती हूं. 
 

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