नई दिल्ली: देश में कुछ समय पहले असिष्णुता को लेकर कितना बवाल मचा. रोहित वेमुला की मौत पर भी देश में जमकर हंगामा हुआ लेकिन दक्षिण के राज्य केरल में एक के बाद एक राजनैतिक हत्याए हो रही है और देश में कही कोई आवाज नहीं उठी. ये सवाल देश की संसद में बीजेपी ने उठाया तो सदन में जमकर हंगामा मच गया.
 
30 जुलाई को केरल के तिरुवनंतपुरम में आएसएस कार्यकर्ता की हत्या के बाद अब ये सवाल बड़ा होता जा रहा है कि आखिर केरल में राजनैतिक हत्याओ का सिलसिला रुक क्यों नहीं रहा है. देश के दक्षिण में बसे इस छोटे से राज्य में ऐसी कैसी राजनैतिक अस्थिरता ने अपनी जड़े जमा ली है जो बार-बार अपने पनपने के लिए खून मांग रही है. 
 
भारतीय राजनीति की प्रयोगशाला कहे जाने वाले केरल में ये कैसा प्रयोग हो रहा है. ताजा मामला इसी शनिवार का है जब एक हिस्ट्रीशीटर अपराधी के नेतृत्व वाले एक गिरोह ने शनिवार की देर रात आरएसएस के 34 साल के कार्यवाह राजेश पर हमला कर उनकी हत्या कर दी. हत्या इतनी बेरहमी से की गई कि उनका बायां हाथ काट दिया गया और उनके शरीर पर हथियार से दर्जनों वार किए गए.
 
हत्या का आरोप सीपीएम के सदस्यों पर लगा था लेकिन लेकिन सीपीएम ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया. लेकिन मामले ने अब तूल पकड़ लिया है विरोध में बीजेपी ने बंद का एलान किया है. कन्नूर में 18 जनवरी को भाजपा के कार्यकर्ता मुल्लाप्रम एजुथान संतोष की हत्या की गई. कोझीकोड के पलक्कड़ में 28 दिसंबर को बीजेपी नेता चादयांकलायिल राधाकृष्णन की हत्या कर दी गई.
 
इतिहास तो खूनी रहा ही है लेकिन ताजा आकड़ा देखे तो केरल में बीते 17 महीनों में 17 राजनैतिक हत्याएं हो चुकी है और ये बड़ी चिंता है. ना सिर्फ केरल के लिए बल्कि देश के लिए भी. खुद गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी केरल के सीएम पी.विजयन से केरल में बढ़ती हुई राजनीतिक हिंसा बातचीत की और कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक हिंसा स्वीकार्य नहीं है.
 
लेकिन सीपीएम इस फोन करने को भी बीजेपी की राजनीति का हिस्सा बता रही है. केरल में आरएसएस कार्यकर्ता राजेश की हत्या के बाद बीजेपी ने इस मुद्दे को जोर शोर से संसद में उठाया और विपक्ष पर जोरदार हमला किया. बुधवार को शून्यकाल के दौरान सबसे पहले कर्नाटक के धारवाड़ से बीजेपी के सांसद प्रहलाद जोशी ने इस मुद्दे को उठाया.
 
1952 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस को चार सौ नवासी में से तीन सौ चौसठ  सीटें मिली थीं और सीपीआई देश की पहली विपक्षी पार्टी बनी थी. लेकिन बाद में CPI में कब्जे और सत्ता को लेकर संघर्ष शुरु हो गया और पार्टी टूट गई. फिर एक वक्त आया कि बंगाल में भी CPM नहीं बची और अब केवल केरल और त्रिपुरा में बची है और यही वजह है कि RSS कहता है कि वो अपने वजूद को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है. 
 
आजादी से पहले कम्यूनिस्ट पार्टी का भारत में अच्छा खासा दखल था. अंग्रेजों के संघर्ष के दिनों में उसका प्रभाव भी ट्रेड यूनियनों पर अच्छा खासा रहा. उसका फायदा पहले आम चुनावों में सीपीआई को मिला. लेकिन उसके बाद सीपीआई में पोलित ब्यूरो पर कब्जे और सत्ता को लेकर संघर्ष शुरु हो गया. एक धड़ा ऐसा था जो प्रगतिवाद की वकालत करता था जबकि वहीं दूसरा धड़ा संघर्ष का रास्ता सही मानता था.
 
इसी वैचारिक मतभेद के चलते तीसरे आम चुनाव के बाद 1964 में सीपीआई टूट कर दो धड़ों में बंट गई. एक CPI और दूसरी CPM. देश में राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदलता रहा और कम्यूनिस्ट पार्टियां इससे तालमेल नहीं बिठा सकीं. लेफ्ट पर हमेशा से ही खूनी राजनीतिक करने का आरोप लगता रहा है.
 
वहीं अगर लेफ्ट की बात करें तो लेफ्ट ये आरोप लगाती है कि खूनी राजनीति करने वाले वो नहीं बल्कि आरएसएस है. तृणमुल ने बंगाल में लेफ्ट सरकार को उन्हीं की भाषा में जवाब देना शुरु किया. पत्थर के बदले पत्थर की ये रणनीति तृणमुल के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुई और नतीजा ये हुआ कि 2011 में बंगाल पर 34 साल तक राज करने के बाद लेफ्ट को महज़ 4 साल पहले बनी तृणमुल कांग्रेस ने उखाड़ फेंका और ऐसा फेंका कि वापसी की उम्मीद ही नजर नहीं आ रही.
 
2011 में तृणमुल कांग्रेस ने 184 सीटें जीतीं जबकि कांग्रेस ने 42 और लेफ्ट 62 पर सिमट गया. 2011 में लेफ्ट का बंगाल से खात्मा एक बड़ी घटना थी क्योंकि वो दुनिया में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाली लेफ्ट सरकार थी.
 
अब पूरे देश में लेफ्ट पार्टियों के पास सत्ता के नाम पर सिर्फ और सिर्फ त्रिपुरा और केरल ही बचा हुआ है. पूरे देश से लेफ्ट पार्टियों का राजनीतिक करियर अधर में लटका है. केरल में भी लेफ्ट को सत्ता के लिए बारी लगानी पड़ती है. पिछले 4 दशकों में वहां का राजनीतिक ट्रेंड यही है.
 
1970 में CPI की सरकार बनी और 77 में कांग्रेस की. उसके बाद से कांग्रेस और लेफ्ट की बारी बंध गई है. अब आलम ये है कि केरल में भी ताजा राजनीतिक माहौल में CPM की सरकार तो है लेकिन वो अब सत्ता पर एकाधिकार का दावा नहीं कर सकती. केरल में भी उसकी जड़े कमजोर होने के दावे अब ज्यादा जोर पकड़ने लगे हैं. 
 
(वीडियो में देखें पूरा शो)

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