बलरामपुर: एक 10वीं पास पिता, जो अपने परिवार का पेट भरने के लिए ऑटोरिक्शा चलाता है. उसकी बेटी तमाम मुश्किलों के बावजूद IIT जैसे बड़े COMPETITION में सलेक्ट हो जाती है और अपनी जैसी कई बेटियों को आगे बढ़ने और पढ़ने की प्रेरणा देती है. 
 
जब एक ही कमरे में खाना बने और उसी में सोना पड़े तो वहां पर कुछ सपने भी पलते हैं और ये सपने आगे चलकर आसमान पर अपना नाम लिख देते हैं. छत्तीसगढ़ के बलरामपुर ज़िले में रहने वाली किरण पटवन्धी की पहचान एक ऑटोवाले की बेटी के तौर पर थी. लेकिन उसने अपनी मेहनत और लगन ने अपनी और अपने पिता दोनों की पहचान बदल दी. अब इसकी पहचान आईआईटी वाली बेटी के तौर पर होने लगी है.
 
 
10 साल तक साइकिल रिक्शा खींचकर परिवार पालने वाले भगवान पटवन्धी के पास अब ऑटो है लेकिन मुश्किलें अब पहले से ज्यादा हैं. इन तमाम मुश्किलों के बावजूद भगवान पटवन्धी ने बच्चों की पढ़ाई नहीं रोकी. कारण था कि वो खुद पढ़ना चाहते थे लेकिन पैसों की तंगी की वजह से 11वीं का इम्तिहान नहीं दे सके.
 
भगवान की मेहनत धीरे धीरे रंग लाने लगी. बेटी किरण उनके जीवन में वाकई उम्मीद की किरण साबित हुई. बचपन से ही पढ़ने में मेधावी किरण ने अपनी अधिकतर पढ़ाई वज़ीफे पर ही की और फिर वो कर दिया जिसके लिए पूरा ज़िला उसको सलाम कर रहा है  और पढ़ाई में मदद के लिए खुद जिला कलेक्टर मदद कर रहे हैं.
 
 
किरण ने आईआईटी परीक्षा में 169वां स्थान हासिल किया है और अब वो आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली जाने की तैयारी में है लेकिन ये किरण के लिए महज एक पड़ाव है आगे वो आईएएस बनना चाहती है. किरण ने तमाम परेशानियों के बावजूद जिस तरह अपनी मेहनत और लगन से सफलता हासिल की है उससे सभी को भरोसा है कि एक दिन वो अपने सारे सपने जरुर पूरा करेगी.

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