भोपालः राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के विवादित बयान से शुरु हुई राजनीति में मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री उमा भारती भी कूद गईं हैं. उमा ने भागवत के बयान का बचाव करते हुए कहा कि आजादी के बाद पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने RSS से मदद मांगी थी. और स्वयं सेवक मदद करने के लिए पहुंचे भी थे.

उमा ने सीधे तौर पर मोहन भागवत के विवादित बयान पर कुछ नहीं कहा. लेकिन उमा ने अपनी बात में ये कहा कि जब कश्मीर रियासत के महाराज हरि जय सिंह कश्मीर के भारत में विलय की संधि पर हस्ताक्षर नहीं कर रहे थे तो शेख अब्दुल्ला ने उनपर हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया था. ये बयान उमा भारती ने  भोपाल में पत्रकारों संबोधित करते हुए दिया. 

उमा ने कहा कि जब नेहरु मुश्किल में फंसे हुए थे और पाकिस्तान की तरफ से अचानक हमला कर दिया गया और उनके सैनिक उधमपुर की तरफ बढ़ते जा रहे थे. उस वक्त हमारी सेना के पास इतने आधुनिक संसाधन नहीं थे कि वे वहां तक पहुंच कर स्थिति को संभाल सकें. उमा ने कहा, ‘उस समय नेहरूजी ने गुरू गोवलकर (तत्कालीन आरएसएस प्रमुख एम एस गोवलकर) आरएसएस के स्वयंसेवकों की मदद मांगी, आरएसएस स्वयंसेवक मदद के लिए जम्मू-कश्मीर गए थे.’

केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने मोहन भागवत के उस बयान का बचाव करते हुए अपना बयान दिया है जिसमें मोहन भागवन ने 11 फरवरी को बिहार के मुज्जफरपुर में कहा था कि ‘अगर ऐसी स्थिति पैदा हो और संविधान इजाजत दे तो स्वयंसेवक मोर्चे पर जाने को तैयार हैं. जिस आर्मी को तैयार करने में 6-7 महीने लगते हैं, संघ उन सैनिकों को 3 दिन में तैयार कर देगा.

भागवत ने आगे कहा था कि संघ कोई मिलिट्री नहीं है लेकिन संघ में सेना जैसा ही अनुशासन है. स्वंय सेवक हमेशा देश के लिए जान न्योछावर करने के लिए तैयार रहते हैं. जब 1962 में भारत-चीन जंग के दौरान जब सिक्किम के तेजपुर से अधिकारी और पुलिस अफसर भाग खड़े हुए थे, तब वहां सेना के पहुंचने तक स्वयंसेवक बॉर्डर पर डटे रहे थे. स्वयं सेवकों ने फैसला किया था कि चीनी आर्मी को बिना कोई विरोध किए भारतीय सीमा में घुसने नहीं देंगे. स्वयंसेवक हर उस काम को पूरा करते हैं, जो उन्हें दिया जाता है.

 

बॉर्डर पर लड़ने के लिए सेना 6 महीने में तैयार होगी और RSS केवल 3 दिनों में: मोहन भागवत

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