मुंबई. महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के 19 दिन बाद भी सरकार का गठन नहीं हो पाया. इसके चलते राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की घोषणा कर दी है. इससे पहले राज्यपाल ने बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी को अलग-अलग सरकार बनाने का न्योता दिया था. मगर तीनों ही पार्टियां सरकार बनाने में सफल नहीं हो सकी. शिवसेना राष्ट्रपति शासन के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है और तुरंत सुनवाई की मांग की है. शिवसेना समेत कांग्रेस और एनसीपी का कहना है कि महाराष्ट्र में राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लगाने में बहुत ज्यादा जल्दी दिखाई है. उन्हें सरकार गठन करने के लिए महज 24 घंटे का समय दिया.

राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने चुनाव नतीजे आने के बाद सबसे पहले बीजेपी को 48 घंटे में सरकार बनाने का न्योता दिया. जब बीजेपी सरकार गठन करने में नाकाम रही तो राज्यपाल ने शिवसेना को बुलाया. हालांकि शिवसेना को सिर्फ 24 घंटे का ही वक्त मिला. पार्टी ने राज्यपाल से 48 घंटे का समय देने की गुहार लगाई लेकिन वो खारिज हो गई.

इसके बाद मंगलवार शाम एनसीपी को सरकार बनाने का न्योता दे दिया गया. अब बुधवार को 24 घंटे पूरे भी नहीं हुए और राज्यपाल ने महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने की अर्जी केंद्र में भेज दी. दो घंटे के भीतर ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उस अर्जी पर मुहर लगा दी.

शिवसेना और एनसीपी नेताओं का कहना है कि उन्हें सरकार गठन करने का उचित समय नहीं मिला. राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लगाने में तत्परता दिखाई.

राजनीतिक जानकारों की मानें तो जिस प्रकार बीजेपी को सरकार गठन करने के लिए 48 घंटों का समय दिया गया था, उसी तरह अन्य पार्टियों को भी उतना ही समय दिया जाना चाहिए था. वहीं शिवसेना के बाद एनसीपी को 24 घंटों का समय दिया गया तो समय खत्म होने से पहले ही राष्ट्रपति शासन क्यों लगा दिया गया.

हालांकि यह सब कुछ राज्यपाल के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है. राज्यपाल को यदि लगे कि प्रदेश में सरकार का गठन करने में पार्टियां सक्षम नहीं है तो वह राष्ट्रपति शासन लगाने को मंजूरी दे सकते हैं. और यहां भी ऐसा ही हुआ.

इसी बीच कुछ लोगों का मानना है कि जब राज्यपाल ने बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी को सरकार बनाने का न्योता दिया तो कांग्रेस को क्यों छोड़ दिया. भले ही एनसीपी और कांग्रेस साथ मिलकर चुनाव लड़ी. मगर कांग्रेस को भी एक बार मौका मिल जाता तो शायद कुछ और संभावनाएं बन सकती थीं.

महाराष्ट्र के वोटरों के साथ हुआ धोखा-
महाराष्ट्र में चुनाव से पहले बीजेपी और शिवसेना ने गठबंधन किया. जनता ने इस गठबंधन को पूर्ण बहुमत के साथ जीत दिलाई. मगर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते एनडीए में फूट पड़ी और शिवसेना ने बीजेपी से अपना रास्ता अलग कर दिया. दोनों पार्टियां अपने अहंकार में अड़ी रहीं.

नतीजतन न तो बीजेपी सरकार बना पाई और न ही शिवसेना. शिवसेना ने एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार गठन के भी प्रयास रहे, लेकिन वहां भी विफलता मिली.

कर्नाटक में सरकार गठन के लिए मिला था 15 दिनों का वक्त-
पिछले साल ही कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव के बाद किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. कांग्रेस और जेडीएस ने रिजल्ट के बाद गठबंधन कर सरकार बनाने का दावा किया.

मगर राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता दिया, भले ही पार्टी के पास बहुमत नहीं था. बीजेपी नेता येदियुरप्पा ने आनन-फानन में सीएम पद की शपथ भी ले ली और बहुमत साबित करने के लिए राज्यपाल ने उन्हें 15 दिनों का वक्त भी दे दिया.

इसके बाद कांग्रेस और जेडीएस ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया. सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत आदेश देते हुए बीजेपी को कुछ ही घंटों की मोहलत दी और बहुमत साबित करने के लिए कहा. हालांकि उस दौरान बीजेपी सदन में बहुमत साबित नहीं कर पा रही थी और येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

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