मुंबई. महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों तमाम कयासों को सच साबित करने की जिद में लगती है. बीजेपी शिवसेना का गठबंधन उस वक्त टूटा जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ कर दिया. इस आंदोलन से इन दोनों पार्टियों ने सियासी फायदा उठाया था. शरद पवार की एनसीपी और कांग्रेस का गठबंधन चुनावी हार के बावजूद सत्ता के ज्यादा करीब है अपेक्षाकृत विधानसभा चुनावों में दुगनी सीट पाने वाली भाजपा के. इस बीच राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की अनुशंसा पर महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग गया है.

बीजेपी के सीएम देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को बताया कि हमारे पास सरकार बनाने के नंबर नहीं हैं. इसके बाद दूसरे नंबर की पार्टी शिवसेना को मौका मिला. एनसीपी ने समर्थन के लिए शर्त रख दी कि पहले शिवसेना भाजपानीत एनडीए से रिश्ता तोड़े उसके बाद इस पर विचार किया जाएगा.

शिवसेना ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में इकलौते मंत्री अरविंद सावंत से इस्तीफा दिलवाया. इसके बावजूद तय समय तक शिवसेना को न एनसीपी न कांग्रेस किसी की तरफ से समर्थन का कोई पत्र नहीं मिला. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की शरद पवार से बात हुई, कांग्रसी विधायकों से बात हुई. शिवसेना का मुख्यमंत्री पद पर दावा मुंगेरी लाल का सपना साबित हुआ.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना के साथ खेल कर दिया!

तय वक्त तक शिवसेना के बहुमत साबित न कर पाने की सूरत में राज्यपाल ने एनसीपी को सरकार बनाने का न्योता दिया. एनसीपी तीसरे नंबर की पार्टी थी. अब ज्यादा संभावना इसी बात की है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगेगा. पार्टियां बहुमत के लिए तिकड़म भिड़ाती रहेंगी. लेकिन इसी पूरी कवायद में कांग्रेस ने छुपे रुस्तम की भूमिका निभाई. शिवसेना जो हिंदुत्व की राजनीति के लिए जानी जाती है उसके साथ दिखने का खतरा कांग्रेस नहीं उठा सकती थी. लेकिन कांग्रेस ने अपने पत्ते भी नहीं खोले. अपने सभी विधायकों को कांग्रेस शासित राजस्थान की राजधानी जयपुर में पहले ही भेज दिया था. ताकि किसी किस्म की हॉर्स ट्रेडिंग के खतरे को टाला जा सके.

शिवसेना के साथ तो सबसे तगड़ी चोट हुई!

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के घर मातोश्री के आगे कभी आदित्य ठाकरे फॉर सीएम तो कभी उद्धव ठाकरे फॉर सीएम का पोस्टर चस्पा होता रहा. इस बीच कांग्रेस ने बीजेपी और शिवसेना का तीन दशक पुराना याराना तोड़ दिया. इससे पहले तमाम बयानवीरों के जुबानी युद्ध के बावजूद बीजेपी और शिवसेना सरकार बना लेती थीं. पिछले विधानसभा चुनाव में तो बीजेपी और शिवसेना ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. लेकिन नतीजों के बाद दोनों दोबारा साथ आ गए और राज्य में पांच साल बहुमत की सरकार चलाई.

BJP का अंहकार,शिवसेना की जिद और कांग्रेस की चालाकी

2019 के विधानसभा चुनावों में दोनों पार्टियां गठबंधन के तहत ही चुनाव लड़ीं. जनता ने बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को बहुमत से अधिक सीटें दीं. 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत के लिए 145 विधायक होने चाहिए. बीजेपी के 105 और शिवसेना के 56 को मिला दें तो यह आंकड़ा 161 तक पहुंच जाता है जो बहुमत से काफी ज्यादा है. इसके बावजूद महाराष्ट्र में अगर राष्ट्रपति शासन लगने की बात हो रही है तो यह बीजेपी के अंहकार, शिवसेना की जिद और कांग्रेस की चालाकी का नतीजा है.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की भी तारीफ करनी होगी कि वो हर डेवपलपमेंट पर बारीक नजर रखे हुईं थीं. खुद विधायकों और एनसीपी के संपर्क में थीं. इसके बावजूद एनसीपी की तरह शिवसेना को सपोर्ट करने का एक भी बयान किसी कांग्रेसी नेता की तरफ से नहीं आया. असदद्दुीन ओवैसी की पार्टी के महाराष्ट्र में दो विधायक जीते हैं. ओवैसी ऐलान करते फिर रहे थे कि वो शिवसेना की अगुवाई वाले किसी गठबंधन को समर्थन नहीं देंगे. महाराष्ट्र में दो विधायकों का किसी समीकरण में कुछ खास महत्व नहीं है.

ओवैसी के ऐलान के बाद मुस्लिम वोट की कीमत पर सत्ता में नहीं आती कांग्रेस!

इसके बावजूद ओवैसी मुस्लिमों को यह संदेश देना चाहते थे कि अब उनकी रहनुमाई करने वाले वो अकेले बचे हैं. कांग्रेस भी हिंदुवादी शिवसेना को समर्थन देने जा रही है. लेकिन यहीं पर कांग्रेस ने चालाकी दिखाई. अंतिम समय तक अपने पत्ते नहीं खोले. शिवसेना को केंद्र की सत्ताधारी गठबंधन एनडीए से भी अलग करवा दिया. बीजेपी को भी सत्ता से दूर कर दिया. खुद भी शिवसेना को समर्थन देने के आरोप से बच गई.

भाजपा के शाह को महाराष्ट्र में मात!

महाराष्ट्र के पूरे क्राइसिस को मैनेज नहीं कर पाने के लिए बीजेपी का आलकमान और स्थानीय नेतृत्व दोनों फेल रहे. शिवसेना अतिउत्साह में कदम उठाती रही कि इस बार शिवसैनिक ही महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनेगा. लेकिन गोवा और मेघालय में कम सीटें लाने के बावजूद सरकार बनाने वाली बीजेपी को महाराष्ट्र में अपने विरोधियों से लगभग दुगनी सीटें लाने के बावजूद सत्ता से दूर रह जाना पड़ा. राजनीति के शतरंज में शह मात का खेल चलता है सियासी शतरंज में बीजेपी शाह की बदौलत हमेशा विरोधियों को मात दे रही थी. लेकिन इस बार अंदरखाने के झगड़े में उलझी दोनों समान विचारधारा वाले तीन दशक पुराने साथी अलग भी हो गए और सत्ता भी नहीं मिली. ये तो कुछ वहीं बात हो गई कि न ख़ुदा ही मिला न विसाल ए सनम!

Read Also ये भी पढ़ें:

President rule in Maharashtra: महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन के लिए राज्यपाल ने की सिफारिश, पीएम नरेंद्र मोदी ने बुलाई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक, शिव सेना जा सकती है सुप्रीम कोर्ट

Uddhav Thackeray Shiv Sena Quits Narendra Modi NDA: महाराष्ट्र में सत्ता युद्ध- अमित शाह की बीजेपी को लगा ये तो उद्धव ठाकरे की शिवसेना है, हमेशा की तरह मान जाएगी