नई दिल्ली. महाराष्ट्र की सियासत को लेकर एक महीने बाद आज शनिवार को रिजल्ट सामने आ गया है. प्रदेश में एक बार फिर से बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री के रुप में शपथ ली है और वहीं एनसीपी के विधायक दल के नेता अजित पवार ने उप-मुख्यमंत्री के रुप में शपथ ली है. जहां कल शुक्रवार को शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी की बैठक में उद्धव ठाकरे का नाम सीएम के लिए आ रहा था और वह नाम सिर्फ बैठक की चर्चा में ही रहा गया. एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने अजित पवार के फैसले पर कहा कि वह उनका निजी फैसला है.

राजनीति या मजाक

दवेंद्र फडणवीस ने जहां एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई है वही इस एनसीपी को चुनावी रैलियों में खरी खोटी सुनाते थे. आखिर इस सियासी संग्राम में यह साफ पता चला रहा है कि राजनीति में कब कौन किसके साथ मिल जाए यह कहना गलत नहीं है.  क्योंकि अधिकतर लोग इस गठबंधन को विकास नहीं स्वार्थ का नाम दे रहे हैं.

क्योंकि साल 2014 में देवेंद्र फडणवीस ने अपने ट्विटर अकाउंट पर एक ट्वीट करके साफ कहा था कि बीजेपी एनसीपी के साथ कभी गठबंधन  नहीं करेगी. जो लोग इस बात को हवा की तरह चारों तरफ फैला रहे हैं उन्हें बता दूं कि यह एक अफवाह है रहेगी. हम इनके घोटालों को खोल कर रख देंगे.

आखिर टूट गया शिवसेना का सपना

जहां बाला साहेब ठाकरे के नेतृत्व में ही महाराष्ट्र में अधिकतर सरकार बनती थी अब उनके बेटे उद्धव ठाकरे राजनीति में बुरी तरह फ्लॉप हुए हैं. क्योंकि शिवसेना जिस मुख्यमंत्री पद के लिए बीजेपी से अलग हुई थी वह पद अब बीजेपी के पास ही चला गया. हालांकि अब उद्धव शिवसेना पार्टी के लिए क्या करेंगे वह आने वाला समय ही बताएगा.

कहा जाता है कि जब बाला साहेब से किसी ने कहा था कि आप मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनते तो उन्होंने कहा था कि में मुख्यमंत्री के बिना ही उसके बराबार काम करता हूं. मतलब जो बाला साहेब कहते थे वह लगभग महाराष्ट्र में हो जाता था.

महाराष्ट्र का सियासी संग्राम

21 अक्टूबर को हुए प्रदेश में विधानसभा चुनाव में बीजेपी और शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा था. प्रदेश की जनता ने दोनों पार्टियों को जनादेश भी दिया लेकिन शिवसेना की चाह थी कि उनकी पार्टी का मुख्यमंत्री बने क्योंकि गठबंधन के समय 50-50 फॉर्मूले की बात हुई थी. वहीं बीजेपी ने साफ कहा था कि देवेंद्र फडणवीस ही मुख्यमंत्री बनेंगे.

इसके बाद शिवसेना ने एनडीए से अपने सालों पुराने गठबंधन को तोड़कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाथ मिला लिया. वहीं जहां एनसीपी उद्धव ठाकरे के साथ गठबंधन को तैयार थी लेकिन कांग्रेस ने काफी सोच विचार के बाद यह फैसला लिया था.

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