नई दिल्ली. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सुशासन का ढोल फट गया है और तमाशा पूरी दुनिया देख रही है. जेडीयू अध्यक्ष और डेढ़ दशक से बिहार के सीएम नीतीश कुमार से न मुजफ्फरपुर बालिका गृह में बच्चियों का यौन शोषण रूकता है, न इंसेफ्लाइटिस से सैकडों बच्चों की मौत रुकती है, न बिहार में अपराध और हत्याओं का सिलसिला रुकता है और न राजधानी पटना में भारी बारिश के बाद आई बाढ़ का पानी शहर से दो किलोमीटर दूर पर बहती गंगा नदी तक पहुंचाने का इंतजाम हो पाता है. सीएम साहब तो इसे प्राकृतिक आपदा कह अपना पल्ला झाड़ने की बेशर्म कोशिश में हैं. जबकि जल निकासी की व्यवस्था प्रशासन की जिम्मेदारी है. पद्म भूषण से सम्मानित शारदा सिन्हा तक राजेंद्र नगर स्थित अपने घर में बाढ़ के पानी के बीच फंसी हुई हैं. सोशल मीडिया पर अपना दर्द साझा कर मदद की गुहार करती है. उपमुख्यमंत्री चार दिनों तक अपने आवास में फंसे रहते हैं.

बिहार के 13 जिले इस वक्त बाढ़ से प्रभावित हैं. पटना के अलावा मुजफ्फरपुर, दरभंगा, भागलपुर, बेगूसराय, शेखपुरा, चंपारण, हाजीपुर सहित कई इलाकों में लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित हैं. बाढ़ बिहार का सालाना जलसा है! मौत का उत्सव! लालू यादव की राजद सरकार को जंगलराज कहने वाले सुशासन बाबू न बाढ़ का उपाय ढूंढ पाए न लोगों के लिए बेहतर इंतजाम कर पाए.

प्राकृतिक आपदा बारिश और मानवनिर्मित आपदा राजनेता!
बारिश आसमानी आफत है लेकिन प्रशासन का इकबाल खत्म हो जाना नीतीश कुमार का राजनीतिक पतन है. सत्ता के लिए साझेदार बदलने के खेल को नीतीश कुमार ने राजनीतिक शुद्धिकरण का नाम दिया. वहीं बाद में उन्हीं की मंत्री मंजू वर्मा का नाम मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड के गुनाहगारों में आया. नीतीश कुमार मौनी बाबा बने हुए हैं. हर चीज पर चुप्पी साध लेते हैं. अब न बिहार के लिए विशेष दर्जे को लेकर आंदोलन की बात करते हैं न ब्रांड बिहार के बड़बोले दावों की.

क्या विकल्पहीन है बिहार
बिहार के पास विकल्प क्या है. लालू यादव के तथाकथित जंगलराज के बदले नीतीश कुमार का सुशासन मॉडल भी बिहार की जनता लगभग उतने ही वक्त के लिए आजमा चुकी है. न बिहार से पलायन खत्म हुआ, न बिहार की शिक्षा व्यवस्था में सुधार आया. न बिहार में इंडस्ट्री का जाल ही बिछा. नीतीश कुमार के कार्यकाल का इमानदार विश्लेषण तो यहीं कहता है कि उन्होंने बिहार में और कुछ बनाया हो या न हो माहौल जरूर बनाया है. नीतीश कुमार कहां कहां फेल हुए, उस पर एक सरसरी निगाह से देखिए. 

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सत्ता संभालते ही बड़े पैमाने पर नीतीश कुमार ने शिक्षकों, शिक्षामित्रों की भर्ती की लेकिन अब उन्हें ही सरकार शिक्षा का नासूर मान रही है. बिहार में सरकारी शिक्षा व्यवस्था हर स्तर पर चौपट हो चुकी है. प्राथमिक स्कूलों के रसोईए हों या मिडिल स्कूल के कॉन्ट्रेक्ट टीचर या कॉलेजों के प्रोफेसर सभी किसी न किसी वजह से हड़ताल पर जाते रहते हैं. बिहार के प्रतिभाशाली छात्रों को दूसरे राज्यों में पढ़ने जाना पड़ता है.

बिहार की मेडिकल सेवाएं बीमार हैं!
मेडिकल सुविधाओं के लिए लोग स्थानीय डॉक्टरों पर भरोसा नहीं कर रहे. बिहार में खुला नया नवेला एम्स भी गलत खबरों की वजह से सुर्खियां बटोंरता है. लालू यादव के बदले नीतीश कुमार आए अब उनकी जगह कौन आएगा. सवाल यह नहीं है. कोई भी आए, उसके पास बिहार के लिए विजन क्या है. नेताओं के बेटों से बड़ी उम्मीद नहीं जगती. प्रतिभाशाली बिहारी युवा, राज्य छोड़कर जा चुका है. सियासत की अंतिम इनिंग खेल रहे नीतीश कुमार किसी तरह प्रासंगिक बने रहना चाहते हैं.

स्मार्ट सिटी का सपना, प्रदूषित शहरों में नाम अपना
स्मार्ट सिटी की लिस्ट में मुजफ्फरपुर का नाम भी है और पटना का भी. लेकिन बिना इंडस्ट्री के ही दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में अव्वल आने वाले इन शहरों ने बता दिया है कि शहरीकरण की दिशा में बिहार में कैसी भयानक भूलें की जा रही हैं. पटना गंगा नदी के किनारे बसा है. पटना का सारा पानी गंगा में ही जाता है. इसके बावजूद बारिश के कारण पटना में बाढ़ के हालात उतपन्न हो गए हैं. पटना की ड्रेनेज व्यवस्था इतनी चौपट हैं कि पूरा पटना तालाब बना हुआ है. सिटी प्लानिंग में जब राजधानी की ये हालत है तो बिहार के दूसरे शहरों का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.

बिहार ने दिया बुद्ध पर नीतीश ने नहीं ली सुध
पीएम मोदी ने यूएनजीए में कहा था कि भारत ने दुनिया को युद्ध नहीं बुद्ध दिए हैं.बिहार में उन्हीं बुद्ध की कर्मस्थली और तीर्थंकर महावीर की जन्मस्थली वैशाली में एक अदद रेलवे स्टेशन तक नहीं है. बस स्टैंड भी विकसित नहीं है. टूरिज्म की असीम संभावनाओं वाले बिहार के सीएम नीतीश कुमार अपने फेवरेट डेस्टीनेशन राजगीर को भी टूरिस्ट फुटफॉल नहीं दिलवा पाए. बारिश और बाढ़ में डूब रहे बिहार को इंतजार है कि उसके मुखिया की आंख में कब पानी आएगा, और वो जनता के दर्द को दूर करने का प्रयास करेंगे.

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