पुणेः महाराष्ट्र में भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में पुणे के डिप्टी मेयर डॉ. सिद्धार्थ धेंडे के नेतृत्व में बनी तथ्यों की खोज के लिए बनी 9 सदस्यीय समिति ने कोल्हापुर रेंज के आईजीपी को एक रिपोर्ट सौंपी है जिसमें समिति ने इस बात का दावा किया है कि भीमा कोरेगांव में 1 जनवरी को जो हिंसा हुई थी वह पूर्व योजनाबद्ध थी और राइट विंग के कार्यकर्ता संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोट द्वारा बनाई गई थी. इसके अलावा इस रिपोर्ट में पुलिस की कार्यशैली पर भी कई गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा गया है कि जब हिंसा सुनियोजित थी जिसको रोकने के लिए पुलिस ने जानबूझ कर कोई कदम नहीं उठाया.

भीमा-कोरेगांव में 1 जनवरी को हुई हिंसा पर 9 सदस्यीय फेक्ट फाइंडिंग कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिस जगह हिंसा हुई वहां पर पहले से केरोसीन से भरे टैंकर, लाठी , तलवारें भारी संख्या में रखे गए थे. सूत्रों के मुताबिक इस रिपोर्ट में पुलिस को भी कटघरे में खड़ा किया गया है जिसमें उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए पूछा गया कि जब हिंसा की योजना बन चुकी थी यानी हिंसा सुनियोजित थी तो उसे रोकने के लिए पुलिस ने जानबूझ कर कोई जरूरी कदम नहीं उठाया.

रिपोर्ट में संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे पर निशाना साधते हुए कहा गया है कि ये दोनों मिलकर भीमा-कोरेगांव में लगभग 15 साल से ऐशा माहौल बनाने की तैयारी में लगे हुए थे. डिप्टी मेयर सिद्धार्थ ढेंडे के नेतृत्व में 9 सदस्यों वाली समिति ने मंगलवार को पुणे ग्रामीण पुलिस को रिपोर्ट सौंपी थी जो हिंसा की जांच कर रहे हैं. जबकि राज्य सरकार ने हिंसा की जांच के लिए दो सदस्यीय न्यायिक आयोग की स्थापना की है, वहां कई “स्वतंत्र, तथ्यों की खोज” समितियां हैं जो गांव में नए साल के दंगों की जांच कर रही हैं. ऐसी एक समिति का नेतृत्व ढेंडे ने किया था.

रिपोर्ट के बारे में बोलते सिद्धार्थ ने कहा, ‘हमारी समिति के सदस्यों ने उन स्थानों का दौरा किया जहां हिंसा हुई थी. स्पॉट यात्राओं के साथ-साथ हमने ग्रामीणों और पुलिसकर्मियों के साक्षात्कार भी किए थे. स्वतंत्र जांच के बाद, हम एक निष्कर्ष पर आ गए हैं कि यह एक पूर्व-नियोजित हिंसा थी. अपराधियों ने पहले से ही उन स्थानों पर व्यवस्था की थी जहां छड़ें और पत्थरों को पहले ही स्टॉक किया गया था.

रिपोर्ट में एकबोट और भिड़े को हिंसा के मुख्य साजिशकर्ता के रूप में भी नामित किया गया है. एकबोट और भिडे़ हिंसा में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल थे. उनके साथ कुछ पुलिसकर्मी हैं जिन्होंने समय पर कार्य नहीं किया. ढेंडे ने कहा, हमने इन सभी जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ मजबूत कार्रवाई की सिफारिश की है.

इससे पहले एकबोट और भिड़े ने पिछले साल 31 दिसंबर को पुणे में एल्गार परिषद या कॉन्क्लेव नामक एक कार्यक्रम के बाद हिंसा में किसी भी भूमिका से इनकार कर दिया था. कोरेगांव-भीमा दलित इतिहास में एक केंद्रीय स्थान पर है, जिसमें एक बड़ी लड़ाई देखी गई जिसमें 1818 को ब्रिटिश सेना द्वारा पेशवा शासकों को पराजित किया गया था, जिसमें बड़ी संख्या में दलित सैनिक शामिल थे.

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