नई दिल्ली. पंजाब की सत्ता पर काबिज रही कैप्टन और बादल सरकारों की शिक्षा और पंजाबी भाषा विरोधी नीतियों के कारण समूचा पंजाब उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लगातार पिछड़ता जा रहा है, क्योंकि 1996 के बाद पंजाब के सरकारी कालेजों में पढ़ाए जाते सभी विषयों के प्रोफेसरों की कोई पक्की (रेगुलर) भर्ती नहीं की गई।

यह ब्यान आम आदमी पार्टी (आप) पंजाब के सीनियर नेता और पंजाब विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष हरपाल सिंह चीमा ने देते कहा कि सरकारी कालेजों की बुरी स्थिति का आलम यह है कि प्रदेश के कालेजों में दूसरे विषयों के साथ साथ पंजाबी भाषा के प्रोफेसर भी नहीं हैं, जबकि पंजाबी भाषा प्रदेश की सरकारी और आम लोगों की भाषा है। चीमा ने कहा कि पंजाब विधान सभा के आगामी सैशन में प्रदेश में उच्च शिक्षा की बुरी हालत और पंजाबी भाषा समेत दूसरे विषयों के प्रोफेसरों की खाली पड़े पदों का मुद्दा आम आदमी पार्टी की तरफ से विशेष तौर पर उठाया जाएगा।

शुक्रवार को पार्टी के मुख्य दफ्तर से पंजाब की उच्च शिक्षा के बारे में बयान जारी करते हरपाल सिंह चीमा ने बताया कि पंजाब की सत्ताधारी पार्टियों ने प्रदेश में उच्च शिक्षा के विकास के लिए सरकारी स्तर पर उचित कदम नहीं उठाए गए। जिससे पंजाब के नौजवानों को सस्ती और उच्च शिक्षा प्रदान की जा सके। चीमा ने खुलासा किया कि पंजाब में कुल 47 डिग्री कालेज हैं, जिनमें सन 1996 से विभिन्न विषयों के प्रोफेसरों की पक्की (रेगुलर) भर्ती ही नहीं की गई। यहां तक कि सरकार के 47 डिग्री कालेज हैं, परन्तु इन कालेजों में पंजाबी भाषा केवल 18 रेगुलर प्रोफेसर हैं।

1600 पद खाली

हरपाल सिंह चीमा ने बताया क 1990 में पंजाब के सरकारी काॅलेजों में कुल 1873 प्रोफेसरों के पद मंजूर हुए थे। आज 2021 में इन पदों में से तकरीबन 1600 पद खाली हो गए हैं और यह संख्या साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। उन्होंने कहा कि इस समय पंजाब में केवल 347 रेगुलर प्रोफेसर सेवाएं निभा रहे हैं, जिनमें से तकरीबन 39 प्रोफेसर चंडीगढ़ प्रशासन के सरकारी कालेजों में डेपुटेशन पर तैनात हैं। सन 2027 तक तो 347 प्रोफेसरों में से लगभग 300 प्रोफेसर सेवामुक्त हो जाएंगे। चीमा ने कहा प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित सरकारी कालेजों में शिक्षा और प्रोफेसरों की स्थिति ओर भी बुरी है, क्योंकि यहां पढ़ाए जाते विषयों के रेगुलर प्रोफेसर है ही नहीं।

पंजाबी भाषा की प्रदेश में हो रही बुरी हालत के बारे में दुख ज़ाहिर करते हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि सूबे में 47 सरकारी कालेजों में पंजाबी भाषा के कुल 18 रेगुलर प्रोफेसर हैं। इस तरह इन कालेजों में तो प्रति कालेज एक भी पंजाबी प्रोफेसर नहीं है, जबकि पंजाबी भाषा कालेजों में लाजिमी और चुनिंदा विषय के तौर पर पढ़ाने की व्यवस्था की गई है।

हरपाल सिंह चीमा ने दोष लगाया कि पंजाब में से उच्च शिक्षा को एक साजिश के अंतर्गत खत्म किया जा रहा है, जिसके ख़तरनाक नतीजे आने शुरू हो गए हैं, क्योंकि जिन सरकारी डिग्री कालेजों में दाखिला लेने के लिए नौजवान तरसते थे, अब यह कालेज विद्यार्थियों से खाली हो गए हैं। उन दोष लगाया कि अकाली दल, भाजपा और कांग्रेस की सरकारों ने शिक्षा बजट में लगातार कटौती की है, जिस कारण सरकारी क्षेत्र के कालेजों में उच्च शिक्षा का भट्टा बैठता जा रहा है। चीमा ने पंजाब सरकार से मांग की है कि प्रदेश में उच्च शिक्षा के विकास के लिए बजट में विस्तार किया जाए और सभी विषय के प्रोफेसरों की रेगुलर भर्ती करने के साथ साथ जरूरी सुविधाओं का प्रबंध भी किया जाए जिससे पंजाब के नौजवानों में उच्च शिक्षा प्रति उत्साह फिर जगाया जा सके।

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