नई दिल्ली. मध्य प्रदेश में इंदौर से करीब 275 किलोमीटर दूर स्थित रतनगढ़ गांव में एक आदिवासी को अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार कागज, टायर, प्लास्टिक बैग और झाड़ियों से करना पड़ा.  क्योंकि उसके पास लकड़ी खरीदने के पैसे नहीं थे.
 
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अपनी पत्नी की मौत से दुखी और पंचायत के इस बेरहम रुख के कारण उसे पत्नी की चिता जलाने के लिए तीन घंटे तक कचरा इकट्ठा करना पड़ा.  

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार मामला शुक्रवार का है. पति जगदीश ने बताया कि मेरी पत्नी नोजीबाई की मौत शुक्रवार सुबह हुई थी. लकड़ी का इंतजाम करने के लिए हम रतनगढ़ पंचायत के पास गए, लेकिन मुखिया ने कहा कि वह कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास पैसे नहीं है. इसके बाद मदद के लिए पीड़ित सभासद नत्थुलाल भिल के पास गए लेकिन वह बाहर थे.

 
जगदीश ने बताया कि किसी ने हमारी मदद नहीं की. जगदीश ने बताया कि कोई भी रास्ता नहीं निकलने के बाद परिवार ने फावड़े का इंतजाम करके शव को दफनाने का फैसला किया. हम कब्र खोदने जा रहे थे उसी दौरान एक सामाजिक कार्यकर्ता ने हमसे संपर्क किया. उन्होंने बखरी हुई लड़कियों और दूसरे सामान इकट्ठा करने में मदद की, जिसके बाद हम अंतिम संस्कार कर सके. 5 बजे के करीब हमने चिता को आग लगाई. कुछ देर बाद इस बात की खबर प्रशासन को लगी तो मदद के लिए कुछ लकड़ियां भेजी लेकिन तक तक अंतिम संस्कार खत्म होने वाला था.
 
वहीं इस मामले में नीमच के डीएम रजनीश श्रीवास्तव ने खेद जताया है. उन्होंने कहा कि पीड़ित परिवार को हुई इस असुविधा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने बताया कि जैसे ही मुझे घटना की जानकारी मिली मैंने एसडीएम को तुरंत परिवार को लड़कियां उपलब्ध करवाने को कहा. हमने देर कर दी लेकिन लकड़िया पहुंचा दी. उन्होंने बताया कि जिम्मेदार एथॉरिटीज को नोटिस जारी किया गया है.