नई दिल्ली. भारतीय टीम के पूर्व क्रिकेटर मनिंदर सिंह ने हाल ही में मीडिया को इंटरव्यू देते हुए अपनी जिंदगी के कई राज खेले हैं. इंटरव्यू में पूर्व क्रिकेटर ने अपनी जिंदगी की कई बड़ी और छोटी कहानियों को बताया है. उनके लिए संघर्ष में सफलता प्राप्त करना कठिन था तो असफलता उनके लिए विनाशकारी साबित हुई. जिंदगी में कई उतार चढ़ाव आए और मनिंदर ने कड़ी मेहनत की लेकिन उनकी परेशानी मानिसक थी और जब उन्हें किसी तरफ का कोई रास्ता नहीं दिखा तो वह एक वैरागी की तरह शराब की गिरफ्त में आ गए. इस इंटरव्यू में भी उन्होंने खुद बताया कि जब मुझे कहीं कुछ नहीं दिखा तो में बोतल की तरफ चला गया.

उन्होंने अपने नशे की लत पर बताया कि साल 1987 में मैंने पूरी तरह से नशे में डूब गया था और मैं बहुत गुस्सैल और असभ्य हो गया था. इतना ही नहीं मेरे माता-पिता भी मुझे नियंत्रित नहीं कर सकते थे. मैं पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर हो गया था और मेरा भाई तब जाम्बिया में काम कर रहा था. वह मेरे लिए एक दोस्त की तरह था और शायद अगर वह वहां होता तो मैं उसके साथ अपनी निराशा शेयर कर सकता था, हालांकि ऐसा नहीं हुआ और मैं जिंदगी की में नीचे ही डूबता गया.

जब उनसे पूछा गया कि क्रिकेट में आपकी रुचि कैसे और कब हुई तो इस सवाल पर उन्होंने अपनी क्रिकेट करियर की कहानी बताई. बतौर मनिंदर सिंह मुझे बचपन से ही खेल में रुचि थी, मुझे लगता है कि मैं लगभग 11 या 12 साल का था जब मैंने दिल्ली में एक टेस्ट मैच टीवी पर देखा और इसमें मैंने बिशन सिंह बेदी को देखा. वह भी एक सिख थे मैं भी एक सिख था. वह बाएं हाथ के स्पिनर थे मैं बाएं हाथ का बल्लेबाज था, फिर में भी उनकी तरह बनना चाहता था. इसके बाद मैंने अपने माता-पिता को समझाने के लिए काम करना शुरू कर दिया, क्योंकि मैं पढ़ाई में भी बहुत अच्छा था. इसलिए मेरी माँ हमेशा कहती थीं पढ़ाई करो और अच्छा पेशा पाओ. जब साल 1978 मैं 13 साल का था तो मैंने कहा ठीक है मुझे ग्रीष्मकाल में सिर्फ दो महीने खेलने दो. फिर मुझे पता चला कि इंडिया गेट के पास नेशनल स्टेडियम में क्रिकेट खेला जा रहा है.

गर्मी में खेलने पर मेरी मां ने कहा नहीं बहुत गर्मी है और तुम्हें लू लग जायेंगे. हालांकि मेरे भाई ने उसे मना लिया और मुझे दो महीने की अनुमति दी गई. जब मैं घर वापस आया तो मेरी माँ एक गिलास में नींबू पानी के साथ थीं. अगर आप पूरी लगन से कुछ करते हैं, तो आपको गर्मी का अहसास नहीं होता है. नेशनल स्टेडियम में आखिरी दिन था और वहां श्री गुरुचरण सिंह बॉम्बे में एक अखिल भारतीय अंडर -19 शिविर में थे और उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए कहा कि यह सरदार कौन है.

मनिंदर सिंह साल 1982 में 15 साल के थे जब उनके बचपन के हीरो बिशन सिंह बेदी ने उन्हें रणजी ट्रॉफी नॉकआउट मैच में प्रथम श्रेणी में डेब्यू कराया था. वह पाकिस्तान के खिलाफ मैच खेले और उस समय भारत के सबसे कम उम्र के टेस्ट खिलाड़ी थे जिनकी उम्र तब 17 साल और 193 दिन की थी. साल 1980 के दशक के में एक ऐसा दौर आया जब वास्तव में ऐसा लग रहा था कि वह वह बेदी का भी पीछे छोड़ सकते हैं लेकिन तब मनिंदर ने अपनी गेंदबाजी से कुछ अधिक प्रदर्शन नहीं किया. जहां 30 साल की उम्र में जब स्पिनर आमतौर पर अपने करियर के चरम पर पहुंच जाते हैं लेकिन यहां मनिंदर सिंह का करियर समाप्त हो गया.

मनिंदर सिंह के क्रिकेट करियर की बात करें तो उन्होंने 13 टेस्ट , 59 वनडे, 145 फर्स्ट क्लास मैच और 110 लिस्ट ए के मैच खेले हैं. मैदान पर उन्होंने बल्लेबाजी से अधिक गेंदबाजी से शानदार प्रदर्शन किया है, उन्होंने टेस्ट में 88, वनडे में 66 विकेट चटकाए हैं.

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