Ishant Sharma 100th Test Match: क्या आप जानते हैं कि ईशांत शर्मा का 2016 के बाद से टेस्ट मैचों में औसत 22.91 का रहा है और 2018 के बाद यह औसत 19.34 का है जो वेस्टइंडीज़ के तेज़ गेंदबाज़ जेसन होल्डर के बाद दुनिया में सबसे अच्छा है और बतौर तेज़ गेंदबाज़ दुनिया में सबसे अधिक विकेट लेने वाले गेंदबाज़ जेम्स एंडरसन से भी यह औसत बेहतर है। ईशांत अहमदाबाद के न्यू मोटेरा स्टेडियम में 24 फरवरी से होने वाले मुक़ाबले में अपना सौवां टेस्ट खेल रहे हैं। बतौर तेज़ गेंदबाज़ ये एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि उनसे पहले इस मुकाम तक भारतीय तेज़ गेंदबाज़ों में केवल कपिलदेव ही पहुंचे हैं।

पिछले चार वर्षों में उनकी गेंदबाज़ी में सुधार के लिए उन्हें स्कूली दिनों से कोचिंग दे रहे श्रवण कुमार ने कहा कि इन वर्षों में उनकी क़ामयाबी का बड़ा राज़ यह है कि वह अब ज़्यादा समझदारी के साथ गेंदबाज़ी करने लगे हैं। उसकी गेंदबाज़ी में अच्छी खासी सूझबूझ दिखाई देती है। कमज़ोर गेंद से वह पूरी तरह परहेज करते हैं जिससे वह लगातार बल्लेबाज़ पर दबाव बनाने में सफल रहते हैं।

वैसे तो ईशांत गेंद को दोनों ओर स्विंग कराते हैं लेकिन इनस्विंग उनका मुख्य हथियार रहा है। इस बारे में श्रवण कुमार कहते हैं कि आज अच्छी गति के साथ इनस्विंग बॉलिंग उनकी सबसे बड़ी खासियत है जो उनकी नैचुरल क्षमता है। चूंकि उनका इंटैलीजेंसी लेवल बढा है इसलिए वह बीच बीच में रिवर्स स्विंग करके बल्लेबाज़ को बुरी तरह से परेशान कर देते हैं।

चेन्नई में खेले गए दूसरे क्रिकेट टेस्ट में चौथे दिन ईशांत ने नए स्पैल में जो रूट को लगातार पांच गेंदें गुडलेंग्थ से इनस्विंग की। उस समय फील्ड लेग साइड पर फैली हुई थी। जो रूट ने पांचों गेंदें पॉइंट की दिशा में खेलीं। ईशांत ने छठी गेंद की सीम फाइन लेग की ओर रखते हुए ओवर की आखिरी गेंद रिवर्स स्विंग कर दी जो रूट का ऑफ स्टम्प ले उड़ी। वास्तव में उनकी गति वाली स्विंग गेंदें कारगर साबित होती हैं। जो रूट का इस समय दुनिया के शीर्ष पांच बल्लेबाज़ों में शुमार किया जाता है और वह ज़बर्दस्त फॉर्म में हैं।

इतना ही नहीं, ईशांत बाएं हाथ के बल्लेबाज़ों के खिलाफ अलग तरह की रणनीति बनाते हैं। वह ऐसे बल्लेबाज़ों को राउंड द विकेट गेंदबाज़ी करते हैं जिससे उनकी गेंदों को अच्छा कोण मिलता है। श्रवण कुमार का कहना है कि अपनी ओर से वह ऐसी गेंदों को इनस्विंग कराते हैं लेकिन बाएं हाथ के बल्लेबाज़ के लिए वह गेंदें बाहर की ओर जाती हैं। अच्छी गति की कोण लेती हुई ऐसी स्विंग गेंदों को पढ़ना बेहद मुश्किल होता है। बाएं हाथ के बल्लेबाज़ों को इसीलिए उनके खिलाफ परेशानी होती है।

श्रवण कुमार का कहना है कि अगर आपका एक्शन सहज है तो इसके साथ समझौता नहीं करना चाहिए। जब ईशांत मेरे पास पहली बार आया तो वह दसवीं कक्षा में था और उस वक्त उसने रबड की चप्पल पहनी हुई थी। तब इसने कुछेक गेंदें मुझे नेट्स पर करके दिखाईं और मैं इसके एक्शन से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ। इसे गंगा इंटरनैशनल स्कूल में दाखिला दिलाया और उसके बाद वह मेरे पास रोहतक रोड जिमखाना नियमित रूप से आने लगा। एक्शन उसका पहले से ही अच्छा था, बस मुझे उनके रन अप पर काम करना पड़ा। श्रवण कुमार का यह भी कहना है कि उन्होंने भुवनेश्वर कुमार और इरफान पठान को स्पीड की खातिर अपना एक्शन चेंज करते देखा है। दोनों निचले क्रम में उपयोगी रन भी बना लेते थे। जब इन्हें विकेट मिलने कम हो गए तो इसका असर उनकी लाइन एंड लेंग्थ पर भी पड़ा।

श्रवण कुमार कहते हैं कि वह यह बात दावे से कह सकते हैं कि ईशांत शर्मा भारत के पहले वास्तविक पेसर हैं क्योंकि उनसे पहले तेज़ गेंदबाजों का ज़ोर स्विंग या सीम मूवमेंट पर ज़्यादा होता था लेकिन ईशांत 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से लगातार गेंदबाज़ी कराने की क्षमता रखता था। इसीलिए उसे लम्बे-लम्बे स्पैल में गेंदबाज़ी करना खूब रास आता था। एक मौके पर ईशांत के एक्शन पर भी विपरीत असर पड़ा था। उस वक्त वह मेरे पास आया। क्योंकि वह बहुत तेज़ी से सीखने वाले खिलाड़ी थे इसलिए उसने मुझसे बातचीत से ही यह समस्या दूर कर ली। श्रवण ने कहा कि जब ससेक्स काउंटी में ईशांत को ऑस्ट्रेलिया के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ और कोच जैसन गिलेस्पी का साथ मिला तो फुलर लेंग्थ गेंदें और गेंद को हिट करने की कला को उसने बखूबी सीखा। उसके बाद ईशांत में सटीक गेंदबाज़ी के साथ बॉलिंग में इकॉनमी में भी सुधार किया।

श्रवण कुमार कहते हैं कि जब पहले ही साल स्कूल क्रिकेट में उन्होंने ईशांत को खिलाया तो फाइनल में सलवान बॉयज के खिलाफ उसने एक पारी में छह विकेट हासिल किए। इसकी गेंद को इतना उछाल मिल रहा था कि विकेटकीपर को भी जम्प लगाते हुए उसकी गेंद को पकड़ना पड़ रहा था। अंडर 17 के एक मैच में उसने दोनों पारियों में कुल 13 विकेट लेकर तहलका मचा दिया था। जिस साल ईशांत दिल्ली से अंडर 19 खेले, उसी वर्ष वह भारत की अंडर 19 टीम से भी खेले। इतना ही नहीं, विजय हज़ारे ट्रॉफी, देवधर ट्रॉफी भी उन्होंने उसी वर्ष खेली और शानदार प्रदर्शन किया। श्रवण कुमार ने मज़ेदार किस्सा बताया कि एक मैच में उसने बाउंड्री को रोकते हुए डाइव लगा दी जिससे उसे थोड़ी इंजरी हुई। तब मैंने उसे समझाया कि उनकी टीम को उनसे तेज़ गेंदबाज़ी की उम्मीद है और अगर वह गेंदबाज़ी ही नहीं कर पाएंगे तो इससे टीम पर इसका उल्टा असर पड़ेगा। यह बात उसे बहुत जल्दी समझ में आ गई।

श्रवण कुमार को यह भी याद है कि जब पहली बार राष्ट्रीय टीम में जगह मिली तो कई दिग्गज खिलाड़ियों ने ईशांत की क्षमताओं पर सवाल उठाए थे लेकिन ईशांत ने अपने शानदार खेल से सभी आलोचकों का मुंह बंद करा दिया। श्रवण कहते हैं कि राष्ट्रीय टीम में जगह पाने के बाद भी वह अक्सर उनकी एकेडमी में गेंदबाज़ी का अभ्यास करने आता था। मेरी शुरू से ही उन पर अधिकार भावना रही है। मुझे आज भी याद है कि मेरी एक डांट पर उसकी आंखे भर आई थी। तब वहां मौजूद पेरेट्स ने कहा कि ईशांत अब बड़ा खिलाड़ी बन गया है वह अब यहां दोबारा नहीं आएगा। मुझे विश्वास था कि बाप की डांट सुनकर बच्चा हमेशा के लिए मुंह नहीं मोड़ सकता। वही हुआ। वह उसके बाद भी एकेडमी में आया।

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