Depression spreading in  Cricket too

नई दिल्ली। महेंद्र सिंह धोनी को रुपहले पर्दे पर जीवंत करने वाले सुशांत सिंह राजपूत ने पिछले दिनों आत्महत्या कर ली। उसका कारण बताया जा रहा है कि वह डिप्रेशन में थे। कोरोना से दुनिया भर में अभी तक 80 लाख लोग संक्रमित हुए हैं। और साढ़े चार लाख लोग मरे हैं. जबकि डिप्रेशन के शिकार लोगोंं की संख्या 27 करोड़ है. हर साल डिप्रेशन से 8 लाख लोग मर जाते हैं। सेलेब्रिटियों में यह बीमारी महामारी की तरह फैल रही है। एक्टरों के साथ साथ क्रिकेटर भी अधिकतर डिप्रेशन का शिकार होते हैं। 
 
इस विषय पर इंडिया न्यूज के खेल संपादक राजीव मिश्रा ने अवसाद में जी चुके दो क्रिकेटरों से बात की। क्रिकेट के साथ साथ सिनेमा के पर्दे पर उतरने वाले सलिल अंकोला और 1986 में जावेद मिंयादाद से आखिरी गेंद पर छक्का खाने वाले चेतन शर्मा ने अपना दर्द बयां किया। आखिर क्यों कोई इतना मजबूर हो जाता है कि आत्महत्या कर बैठता है। 

क्रिकेट छोड़ने से चले थे डिप्रेशन में

सलिल अंकोला ने 1989 से 1997 के बीच अपने क्रिकेट करियर में एक टेस्ट और 21 वनडे खेले। 27 साल की युवा अवस्था में उनके करियर में ब्रेक लग गया। क्रिकेट मैदान से बाहर लगी इस इंजरी की वजह से वह क्रिकेट से दूर हो गए. उसके बाद सलिल डिप्रेशन का शिकार हो गए थे। सलिल अंकोला ने कहा डिप्रेशन का शिकार होने वाले व्यक्ति का दम घुटने लगता है. कोई रास्ता नहीं सूझता। आपको पता भी नहीं चलता कि कब आप डिप्रेशन में चले जाते हैं। 
सलिल ने कहा, यह ऐसा वक्त होता है, जब इंसान अपने मन की बात किसी से कह नहीं पाता. अंदर ही अंदर घुटता रहता है। एक वक्त ऐसा आ जाता है, जब इतना दम घुटने लगता है कि कोई रास्ता नहीं बचता। मेरे साथ भी एेसा हुआ है। ये जो सब लोग पोस्ट कर रहे हैं कि मुझे फोन कर देता। उस वक्त जब आप फोन करते हो तो कोई उठाता नहीं है। ये मेरे साथ हुआ है। मैैंने कई लोगों से बात करनी चाही. पर किसी ने फोन नहीं उठाया. डिप्रेशन को बयान करना बहुत मुश्किल है. यह अंदरूनी होता है। लेकिन इसमें बह जाना ठीक नहीं। हालांकि कई बार मन में विचार तो आते हैं और इनसे निकलना बहुत मुश्किल होता है। 

27 की उम्र में अंकोला को छोड़ना पड़ा था क्रिकेट

जब मुझे एक इंजुरी के कारण अकस्मात क्रिकेट छोड़ना पड़ा, तो वह समय बहुत कठिन था। मैं केवल 27 साल का था। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में मेरे लिए आठ साल का क्रिकेट बचा हुआ था।  मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. क्योंकि क्रिकेट के सिवाय कुछ सोचा नहीं था। चोट मैदान पर लगी होती तो अलग बात थी पर मैदान पर कुछ नहीं हुआ था। लेकिन जब मैं इस तरह की बातें करने लगता था तो लोगों को कुछ समझ में नहीं आता था। उन्होंने मुझे हमेशा फाइटर की तरह से देखा था। सोचा नहीं था कि मैंं ऐसे कभी बिखर जाऊंगा। मैं अल्कोहल पर रहने लगा था। उसके बाद जो अब मेरी पत्नी हैं, वो मुझे मिलीं. वो खुद डाक्टर थीं। उन्होंने मुझे संंभाला। 

चेतन ने अंतिम गेंद पर खाया था छक्का

भारत के नामी तेज गेंदबाज रहे चेतन शर्मा 1987 के विश्व कप में हैटट्रिक जमाने वाले पहले गेंदबाज थे। लेकिन उससे पहले 1986 के एशिया कप के फाइनल में जावेद मिंयादाद ने उनकी आखिरी गेंद पर छक्का मार कर भारत के मुंह से जीत छीन ली थी। मैच की आखिरी गेंद पर छक्का खाने के कारण चेतन डिप्रेशन में चले गए थे। 
चेतन बताते हैं कि शारजाह से लौटते वक्त मुझे दो किलो ज्यादा बैगेज की समस्या नहीं थी। समस्या कुछ और थी। लेकिन मैं बहुत लकी हूं कि मेरे आस पास लोग मुझे संंभाल लने वाले थे। बहुत अच्छे लोग थे। मेरे कोच देशप्रेम आजाद थे। लौटने के बाद 15 दिन मैं विल्कुल बंद था। किसी से नहीं मिलता था। लेकिन मेरे पिता मुझे अकेला नहीं छोड़ते थे। जब तक मैं आजाद साहब के पास नहीं चला जाता था। उस दौरान उन्होंने मुझे उर्दु भी सिखाना शुरू किया था। आजाद साहब ने मेरे लिए अलग नेट लगाया था, जहां मैं अभ्यास करता था। मेरे कोच एक – दो घंटे मुझसे बातचीत करते थे। 

डिप्रेशन एक साइलेंट किलर 

क्रिकेट एक्सपर्ट अयाज मेमन बताते हैं कि डिप्रेशन एक साइलेंट किलर है। इसमें अपनी मानसिकता से लड़ाई होती है। आप अपने आप में इतना घुल जाते हैं कि बाहर के किसी व्यक्ति को कुछ समझ नहीं आता। और फिर किसी और के पास वक्त भी नहीं है। ऐेसे में जरूरी होता है कि कोई आपकी ओर हाथ बढ़ाए। पहले समझे कि क्या हो रहा है। लेकिन लोगों में समझ नहीं है।