ऑस्ट्रेलिया के पूर्व बल्लेबाज़ डेव व्हाटमोर को बल्लेबाज़ से ज़्यादा कोच के तौर पर याद किया जाता है। वह जब श्रीलंका टीम के कोच बने तो यह टीम 1996 का वर्ल्ड कप जीत गई। वह पाकिस्तान के कोच बने तो उसने एशिया कप जीत लिया। वह बांग्लादेश के कोच बने तो यह टीम टेस्ट क्रिकेट की पहली जीत दर्ज करने में सफल हो गई। वह केरल टीम के कोच बने तो यह टीम रणजी ट्रॉफी के इतिहास में पहली बार क्वॉर्टर फाइनल में पहुंचने में सफल रही। इसके अलावा व्हाटमोर शाहरुख-जूही की टीम कोलकाता नाइटराइडर्स को भी कोचिंग दे चुके हैं।

वही डेव व्हाटमोर आज बड़ौदा की रणजी टीम के कोच हैं और उन पर बीसीसीआई के नए दिशानिर्देशों से तलवार लटक रही है जिनमें साफ तौर पर कहा गया है कि घरेलू क्रिकेट में एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोटोकोल) का पूरा ध्यान रखा जाएगा। इसके तहत 60 साल से अधिक उम्र का कोई भी कोच या सपोर्ट स्टाफ टीम के साथ जुड़ा नहीं रह सकता। इस लिहाज़ से व्हाटमोर की छुट्टी होना तय है लेकिन बड़ौदा क्रिकेट एसोसिएशन के दो पदाधिकारियों में इस बात को लेकर विवाद खुलकर सामने आया है। बड़ौदा क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रणव अमीन व्हाटमोर को बनाए रखने के पक्ष में हैं जबकि इसी एसोसिएशन के संयुक्त सचिव पराग पटेल ने साफ कर दिया है कि उनकी एसोसिएशन इस बारे में एसओपी फॉलो करेगी और बीसीसीआई की हर हिदायत को मानेगी। इस लिहाज से  एक ही एसोसिएशन में गतिरोध पैदा हो गया है। जब ये मामला बीसीसीआई के पास पहुंचा तो उसने इस पूरे मामले को बड़े ही कूटनीतिक तरीके से हल करते हुए साफ कर दिया कि बीसीसीआई का काम है ऐसे दिशानिर्देश जारी करना और कोविड-19 को देखते हुए आदर्श स्थिति को बहाल करना। उसने इसी बात को ध्यान में रखते हुए बड़ौदा ही नहीं सभी राज्य एसोसिएशनों को ऐसे निर्देश जारी किए हैं लेकिन अब उसने यह कहकर यू टर्न ले लिया है कि यह राज्य एसोसिएशन पर निर्भर करता है कि वह उसे किस तरह से लेती है और इस बारे में अंतिम फैसला राज्य एसोसिएशनों को करना है। इस बात के मद्देनज़र लगता है कि व्हाटमोर को जीवनदान मिल सकता है।

यही स्थिति पूर्व टेस्ट खिलाड़ी करसन घावरी और अरुण लाल की भी है। ये दोनों दिग्गज रणजी ट्रॉफी के फाइनल में पहुंचने वाली दोनों टीमों के कोच हैं और दोनों 60 की उम्र से काफी ऊपर हैं। घावरी सौराष्ट्र टीम के कोच हैं जबकि अरुण लाल बंगाल टीम के। अब अगर दो काबिल कोच इन टीमों से अलग हो जाते हैं तो उसका टीम पर भी असर पड़ सकता है। आदर्श स्थिति तो यह थी कि इनके साथ नियमित रूप से दो या तीन ऐसे सहायक कोचों की नियुक्ति कर दी जाती जिनके पास इन दिग्गजों से सीखने का पर्याप्त मौका रहता और सीखने के बाद उनकी सेवाएं मौजूदा टीम के लिए उपयोगी साबित होती। इसी तरह हाल में पिछले वर्षों में विदर्भ टीम को रणजी ट्रॉफी का खिताब दो बार दिलाने वाले चंद्रकांत पंडित 58 वर्ष के हैं और दिल्ली टीम के कोच केपी भास्कर 57 के हैं। ज़ाहिर है कि इन दोनों पर अगले कुछ वर्षों में अपने पद से हटने की तलवार लटक जाए।

ज़ाहिर है कि इस बारे में बीसीसीई का ढुलमुल रवैया सवालों के घेरे में है। वैसे भी बीसीसीआई की 60 प्लस के कोच और सपोर्ट स्टाफ को टाटा बाय-बाय कहना खिलाड़ियों के ही हित में था लेकिन उसने बड़ौदा क्रिकेट एसोसिएशन में उठे विवाद को देखते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए। अब अगर 60 ती उम्र में इम्यूनिटी कमज़ोर होने की वजह से कोई कोच भविष्य में कोविड के लपेटे में आता है तो क्या उसका असर खिलाड़ियों पर नहीं पड़ेगा। इस समय परिणाम बाद में है खिलाड़ियों की सुरक्षा पहले है। बीसीसीआई से उम्मीद की जाती है कि वह आदर्श स्थिति को बहाल करे न कि समझौतावादी फॉर्मूला अपनाकर अपनी पूर्व में कही बात से ही पलट जाए।

 (लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार एवं टीवी कमेंटेटर हैं) 

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