नई दिल्ली: मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि इस समय इंग्लैंड के पास दुनिया का सबसे अच्छा गेंदबाज़ी आक्रमण है। उनके पास विकल्पों की कोई कमी नहीं है। जिस टीम में दो-दो गेंदबाज़ 500 से अधिक विकेट लेने वाले हों तो इससे उस टीम की ताक़त का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। उनके जैसा बॉलिंग अटैक किसी टीम के पास नहीं है। एंडरसन और स्टुअर्ट ब्रॉड के अलावा टीम में जोफ्रा आर्चर, क्रिस वोक्स और मार्क वुड जैसे तेज़ गेंदबाज़ हैं जिससे यह टीम जब चाहे इन गेंदबाज़ों को बदल सकती है।

इंग्लैंड के आक्रमण ने मुझे इसलिए भी प्रभावित किया क्योंकि वेस्टइंडीज़ के खिलाफ पिचें निर्जीव थीं। ऐसी पिचों पर ऐसा प्रदर्शन काबिलेतारीफ है। सच तो यह है कि इंग्लैंड पहला टेस्ट भी जीतने की स्थिति में था लेकिन कुछेक ग़लतियों की वजह से वह यह टेस्ट जीत नहीं सका। विकेट से कोई मदद नहीं थीऐ ऐसी कंडीशंस में गेंदबाज़ों के ऐसे प्रदर्शन के लिए इंग्लैंड वास्तव में बधाई का पात्र है।

आज का क्रिकेट इतना प्रोफेशनल हो गया है कि वीडियो एनेलिस्ट हर बल्लेबाज़ का बारीकी से आकलन करते हैं। पिच और कंडीशंस कैसी है, इसके हिसाब से रणनीति तय की जाती है। ज़ाहिर है कि साउथैम्प्टन टेस्ट में अगर जेम्स एंडरसन ने गेंद को थोड़ा पीछे रखा तो यह सब इंग्लैंड की रणनीति का हिस्सा थे। पहले टेस्ट का विकेट धीमा था। स्विंग बॉलर के लिए हालात काफी चुनौतीपूर्ण थे। ऐसी स्थिति में एंडरसन का काम और भी बढ़ गया। वह जानते हैं कि वह जोफ्रा आर्चर की तरह गेंद को हिट नहीं करते और वोक्स से भी उनकी गेंदबाज़ी काफी अलग है। उन कंडीशंस में बॉल मे चमक भी नहीं थी। स्लाइवा के इस्तेमाल पर भी मनाही थी। इसका असर भी उनकी गेंदबाज़ी पर देखने को मिला।

जहां तक बात स्टुअर्ट ब्रॉड की की जाए, वास्तव में वो ज़बर्दस्त गेंदबाज़ साबित हुए। उन्होंने बेहतरीन गेंदबाज़ी का प्रदर्शन किया। एक तो उनके पास ऊंची कदकाठी है और दुनिया भर में वह सम्भवत: सबसे ऊपर से गेंद को रिलीज़ करते हैं जिससे खासकर बल्लेबाज़ को उन्हें फ्रंट फुट पर खेलने में परेशानी होती है। बल्लेबाज़ उनके सामने कई बार इस बात का समय पर निर्णय नहीं कर पाता कि वह आगे जाए या पीछे। जब तक वह कुछ तय करता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। अपनी इन्हीं सब खूबियों की वजह से वह टेस्ट क्रिकेट में 500 विकेट भी पूरे करने में सफल हो गए हैं लेकिन उनके लिए मैं एक बात ये भी कहना चाहूंगा कि ब्रॉड अपने देश में जितने सफल होते हैं, वैसे दूसरे देश में नहीं हो पाते। यहां तक कि उनकी ताक़त इंग्लैंड के बाहर आधी हो जाती है। इंग्लैंड में गेंद टिप्पा पड़ने के बाद भी स्विंग होती है और उससे पहले भी स्विंग होती है। गेंद का टिप्पा पड़कर कांटा बदलना आम बात है। ऐसे हालात में इंग्लैंड में विकेटकीपिंग करना काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ब्रॉड को जब टीम प्रबंधन ने साउथैम्प्टन में पहले टेस्ट में नहीं खिलाया तो वह बेहद नाराज़ हो गए थे और उन्होंने अपना गुस्सा भी ज़ाहिर किया। ऐसा इसलिए था क्योंकि वह अपनी कंडीशंस में अपनी क्षमताओं को अच्छी तरह जानते थे।

जोफ्रा आर्चर को भी स्लाइवा का इस्तेमाल न करने का नुकसान हुआ। विकेट से उन्हें कोई मदद नहीं थी इसलिए गेंदबाज़ों को जूझना पड़ा। जोफ्रा आर्चर शॉट ऑफ गुडलेंग्थ से गेंद को उठा रहे थे। वह वास्तव में प्रतिभाशाली गेंदबाज़ हैं। अभी उनकी शुरुआत है लेकिन उनमें क्षमताओं की कोई कमी नहीं है। जहां तक क्रिस वोक्स का सवाल है। उन्होंने एक सहयोगी गेंदबाज़ के काम को बखूबी निभाया। हालांकि उनमें उतनी प्रतिभा नहीं है लेकिन टीम में ऐसा गेंदबाज़ भी ज़रूरी होना चाहिए। दरअसल मार्क वुड की जो भूमिका पहले टेस्ट में थी, उसी भूमिका को उन्होंने बाकी टेस्टों में बखूबी निभाया लेकिन फिर भी इन दोनों में क्रिस वोक्स को मैं बेहतर गेंदबाज़ मानता हूं। वुड के पास गति के अलावा कुछ नहीं दिखा जबकि वोक्स शॉर्ट ऑफ गुड लेंग्थ पर लगातार हिट करते रहे। वहीं वुड को अगर स्विंग न मिले तो उन्हें खेलना आसान हो जाता है। यही वजह है कि इस सीरीज़ में खेले एकमात्र टेस्ट में उन्हें खेलने में वेस्टइंडीज़ के बल्लेबाज़ों को कोई परेशानी नहीं हुई।

वहीं इंग्लैंड का वनडे क्रिकेट में बदला हुआ अटैक दिखाई दिया। आयरलैंड के खिलाफ पहले मैच में हमने देखा, उन्होंने बाएं हाथ के डेविड विली के अलावा साकिब महमूद और टॉम करन को उतारा। दरअसल वर्ल्ड कप जीतने के बाद इंग्लैंड की टीम व्हाइट बॉल क्रिकेट में प्रयोग करना चाहती है। ज्यादा से ज़्य़ादा खिलाड़ियों को वनडे में आजमाने का दौर चल रहा है। इन्हीं गेंदबाज़ों में से कुछ अच्छे गेंदबाज़ भविष्य में इंग्लैंड के काम आ सकते हैं।  

(लेखक टीम इंडिया के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ रह चुके हैं)