नई दिल्ली. भारत के मार्कोस (मरीन) कमांडो सबसे ट्रेंड और मार्डन माने जाते हैं. कश्मीर में आतंकी उन्हें दाढ़ीवाली आर्मी कहते हैं. हाईजैकर्स उनसे लड़ने के बजाय खुदकुशी करना पसंद करते हैं. मार्कोस का गठन 1987 में किया गया था. मार्कोस को दुनिया के बेहतरीन यूएस नेवी सील्स की तर्ज पर विकसित किया जा रहा है. 
 
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मार्कोस कमांडो बनाना आसान नहीं है ये 10 हजार में से एक चुने जाते हैं. मार्कोस कमांडो बनने के लिए सबसे कठिन परीक्षा से गुजरा जाता है. बता दें कि मार्कोस कमांडो बनने के लिए सबसे कठिन परिक्षा से गुजरना पड़ता है. इन कमांडोज को सेना से ही चुना जाता है और बेहतरीन सैनिक मार्कोस कमांडोज में जगह मिलती है.
 
मार्कोस कमांडोज़ की शुरुआती ट्रेनिंग कोच्चि के नेवल डाइविंग स्कूल में होती है. मार्कोस कमांडोज़ के चुने जाने की उम्र 20 से 25 साल तक की होती है. इन्हें अमेरिकी और ब्रिटिश सील्स के साथ ढाई साल की कड़ी ट्रेनिंग करने पर ये देश की सुरक्षा के लिए तैयार होते हैं. इन कमांडोज़ को तैराकी से लेकर घुड़सवारी, हाई जम्पिंग, स्काई डाइविंग तक में महारत हासिल होती है. इन कमांडो को स्पेशल कराटे सिखाये जाते है और हर तरह के हथियार, हेलीकाप्टर, जहाज चलाना सिखाया जाता है. 
 
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मार्कोस इंडियन नेवी के स्पेशल मरीन कमांडोज हैं. स्‍पेशल ऑपरेशन के लिए इंडियन नेवी के इन कमांडोज को बुलाया जाता है. मार्कोस कमांडो का मकसद आपात स्थिति में, आतंकी हमले के समय आतंकियों को मारना, मुश्किल हालात में युद्ध करना, लोगों को बंधकों से मुक्त कराना जैसेऑपरेशनों को सफल पूरा करना इनका काम होता है. 2008 के मुबंई आतंकी हमले में मार्कोस ने आतंकियों से ताज होटल को अपने कब्जे में ले लिया था तब इन कमांडो का प्रयोग किया गया था. 
 
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