नई दिल्ली. हाथों की लकीरों में अपने लिए लकीरें खींचने वाले लोग अपने आप में एक बड़ी मिसाल बन जाते हैं ? वे कुछ ऐसा करते हैं जिससे दूसरों में जीने की उम्मीद और हौसला दोनों पैदा होते हैं. ऐसे ही लोग संघर्ष को सही मायने देते हैं. 
 
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ऐसी ही कुछ कहानी है अभिनेता गुरुदत्त की. आज से ठीक 91 साल पहले बैंग्लुरू के एक ब्राहम्ण परिवार में पैदा हुए गुरुदत्त अभाव, अलगाव और भटकाव से लगातार जूझते रहे. अपनी ख्वाहिशों की दुनिया लिए यह अभिनेता लगातार लड़ता रहा. 
 
गुरुदत्त को बचपन से ही डांस का शौक था, लेकिन पैसे की कमी के चलते मैट्रिक के आगे नहीं पढ़ पाए थे. अलमोड़ा में मशहूर पंडित उदयशंकर से गुरुदत्त ने डांस सीखा. यही नृत्य गुरुदत्त की जिंदगी का गाईड बन गया.
 
गुरुदत्त हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता, निर्देशक एवं फ़िल्म निर्माता थे. उन्होंने 1950 वें और 1960 वें दशक में कई उत्कृष्ट फिल्में बनाईं जैसे प्यासा,कागज़ के फूल,साहिब बीबी और ग़ुलाम और चौदहवीं का चाँद. विशेष रूप से, प्यासा और काग़ज़ के फूल को टाइम पत्रिका के 100 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की सूची में शामिल किया गया है.
 
गुरुदत्त, उनकी बीवी गीता दत्त और उनका प्रेम वहिदा रहमान इन तीनों के बीच रिश्तों की ऐसी उलझन पड़ी रही कि जो लाख सुलझाए नहीं सुलझी. वहिदा रहमान के लिए गुरुदत्त पागलपन की हद तक जा चुके थे, लेकिन प्यार न मिलने पर उनका जीवन आहों से भर गया था. गुरुदत्त के अफेयर से नाराज होकर उनकी पत्नी गीता ने घर छोड़ दिया था.
 
पत्नी और मोहब्बत के बीच फंसे गुरुदत्त ने शराब का दामन थाम लिया था. 9 अक्टूबर 1965 की रात को गुरुदत्त ने आखिरी बार अपनी पत्नी गीता से बात की. गुरुदत्त आखिरी बार अपनी ढाई साल की बेटी से मिलना चाहते थे. उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था कि मुझे मेरी बेटी से बात करनी है, उसे भेज दो वर्ना मेरा मरा मुंह देखोगी. नींद की गोलियां खाकर गुरुदत्त ने दुनिया को अलविदा कह दिया.
 
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इंडिया न्यूज के खास शो ‘संघर्ष’ में मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत आपको बताएंगे कि गुरुदत्त के जीवन में क्या उतार-चढ़ाव आए. इसके साथ ही उन्होंने फिल्मों के इतिहास में अपना नाम कैसे दर्ज किया.
 

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