उज्जैन: श्मशान एक ऐसा नाम है जिसे सुनकर हर कोई कांप जाता है, लेकिन अगर उसी श्मशान में जलती हुई चिताओं के पास बैठकर कोई आधी रात के डराते अंधेरे में बैठकर साधना करे तो निश्चित तौर पर ऐसी तस्वीर मजबूत से मजबूत दिलवालों के भी रीढ़ में सिहरन पैदा कर सकती है. साथ ही पैदा होते हैं कुछ ऐसे सवाल जिसे भारतीय समाज में जानना हर कोई चाहता है लेकिन पूछता नहीं है.  भारतीय समाज में तंत्र साधना की छवि ऐसी है कि सुनने वाला और देखने वाला दोनों न सिर्फ डरते हैं बल्कि उस राह भी नहीं चलते जहां तंत्र साधक दिखाई दे जाते हैं. 
 
सिंहस्थ के दौरान उज्जैन में एक ऐसा संयोग होता है जिसमें तंत्र साधना वालों को साधना का पूरा फल मिलता है. यही कारण है कि सिंहस्थ के दौरान देश विदेश से हज़ारों साधक उज्जैन पहुंचते हैं अपनी साधना को पूरा करने के लिए. 
 
अघोरी की कल्पना की जाए तो श्मशान में तंत्र क्रिया करने वाले किसी ऐसे साधु की तस्वीर जेहन में उभरती है जिसकी वेशभूषा डरावनी होती है. अघोरियों के वेश में कोई ढोंगी आपको ठग सकता है लेकिन अघोरियों की पहचान यही है कि वे किसी से कुछ मांगते नहीं है और बड़ी बात यह कि तब ही संसार में दिखाई देते हैं जबकि वे पहले से नियुक्त श्मशान जा रहे हो या वहां से निकल रहे हों. दूसरा वे कुंभ में नजर आते हैं. 
 
अघोरी को कुछ लोग ओघड़ भी कहते हैं. अघोरियों को डरावना या खतरनाक साधु समझा जाता है लेकिन अघोर का अर्थ है अ+घोर यानी जो घोर नहीं हो, डरावना नहीं हो, जो सरल हो, जिसमें कोई भेदभाव नहीं हो. कहते हैं कि सरल बनना बड़ा ही कठिन होता है. सरल बनने के लिए ही अघोरी कठिन रास्ता अपनाते हैं. साधना पूर्ण होने के बाद अघोरी हमेशा- हमेशा के लिए हिमालय में लीन हो जाता है. 
 
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