नई दिल्ली. महर्षि वाल्मीकि जन्म आश्विन माह में शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था. महर्षि वाल्मीकि को वैदिक काल का महान ऋषि कहा जाता हैं. वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में रामायण की रचना की थी. जिसकी प्रेरणा उनको भगवान विष्णु से मिला था. महर्षि वाल्मीकि  कई भाषाओं के जानकार थे. महर्षि वाल्मीकि एक कवि के रूप में भी जाने जाते हैं. उन्होंने दुनिया का पहला महान महाकाव्य रामायण का रचना किया था. इसलिए उनको आदि कवि भी कहा जाता है. शरद पूर्णिमा इस बार 13 अक्तूबर को है. इसी दिन महर्षि वाल्मीकि की जयंती मनाई जाएगी.

महर्षि वाल्मीकि दवारा रचित रामायण पहला महाकाव्य है, जिसमें भगवान श्रीराम के जीवन की सभी घटनाओं को काव्य के रूप में लिखा गया है. भगवान विष्णु से प्रेरणा लेने के बाद महर्षि वाल्मीकि ने रामायण ग्रंथ की रचना की थी. रामायण के रचयिता के रूप में महर्षि वाल्मीकि जी की प्रसिद्धि है. पुराणों के अनुसार महर्षि वाल्मीकि का जन्म नागा प्रजाति में हुआ था.

ऋषि मुनि बनने से पहले एक डाकू थे जिन्हें रत्नाकर नाम से दुनिया जानती थी. मनुस्मृति के अनुसार महर्षि वाल्मीकि प्रचेता, वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि के भाई थे. उनके बारे में एक और कहानी है कि जब वे छोटे बच्चे थे. उनको एक निःसंतान महिला ने चुरा लिया था. उसने बड़े ही प्यार से महर्षि वाल्मीकि का पालन-पोषण किया. उस महिला के जीवनयापन का मुख्य साधन डकैती और लूट-पाट करना था. बड़े होने पर महर्षि वाल्मीकि ने अपने भरण-पोषण के लिए डकैती और लूट-पाट का रास्ता चुना.

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एक बार महर्षि वाल्मीकि जंगल से गुजर रहे साधुओं की मंडली को लूटने लगे. साधु ने उनसे पूछा कि सब गलत काम तुम क्यों करते हो. इस पर वाल्मिकि ने कहा कि ये सब काम अपने पत्नी और बच्चों की गुजारा करने लिए कर रहे है. साधुओं के मंडली में से एक साधु ने उन्हें समझाया कि जो तुम डकैती और लूट-पाट की गलत काम कर रहे हो, इसका दंड केवल तुम्हें ही भुगतना पड़ेगा. इस बात को सुनकर डाकू रत्नाकर उर्फ वाल्मीकि जी ने जोर-जोर से हसंना शुरू कर दिया.

तब उस साधु ने वाल्मीकि को कहा कि तुम घर जाकर अपने परिवार वालों से पूछकर आओ कि क्या वे तुम्हारें इस डकैती और लूट-पाट पाप के भागीदार बनेंगे. वाल्मीकि ने इस बात को अपनी पत्नी और बच्चों के सामने दोहराई. इस बात को सुनकर उनके पाप के कामों में भागीदार बनने से उन्होंने इनकार कर दिया.

उस समय वाल्मीकि को अपने किए गए पाप कामों पर बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने साधु मंडली के सभी लोगों से उसी समय माफी मांग कर उनको मुक्त कर दिया.साधु मंडली से माफी मांग कर जब वाल्मीकि लौटने लगे तब साधु ने उन्हें तमसा नदी के तट पर ‘राम-राम’ नाम जप कर अपने पापों को प्रायश्चित करने का सुझाव दिया. लेकिन वाल्मीकि साधू की बताइ राम-राम को भूल गए और उसकी जगह ‘मरा-मरा’ का जप करते हुए भक्ति में डूब गए. इसी भक्ति के फलस्वरूप ही वह वाल्मीकि के नाम से प्रसिद्ध हुए और महा कावय रामायण की रचना की.

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