नई दिल्ली. कालभैरव की देशभर में अलग-अलग नामों से जाने जाते हैं. महाराष्ट्र की बात करें तो वहां पर खण्डोबा की पूजा होती है. वहीं अगर हम बात करें दक्षिण भारत की तो वहां पर भगवान भैरव का नाम शास्ता है. वैसे हर जगह एक भयदायी और उग्र देवता के रुप में इनको मान्यता मिली हुई है. भगवान भैरव से जोड़कर कई धारणाएं बनी हुई है. शिवपुराण के अनुसार कार्तिक मास के कृष्णक्ष की अष्टमी के मध्यान्ह में भगवान शंकर के अंश से उत्पत्ति हुई है. इसलिए इस दिन को काल-भैरवाष्टमी के नाम से जाना जाता है.

काल-भैरव कालाष्टमी के दिन रात में उड़द की रोटी बानाएं, फिर उसपर तेल लगाकर किसी कुत्ते को खिलाना चाहिए. इस दिन कुत्ते को खाना खिलाना बहुत शुभ माना जाता है. कालाष्टमी के दिन उपवास रखकर भगवान शिव की अराधना करें. मान्यता है कि काल-भैरव की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है.

पौराणिक कथाओं के अनुसार अंधकासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था. राक्षस अंधकासुर ने अपने अत्याचार की सारी सीमाएं पार कर गया था. यहां तक एक बार घमंड में चूर होकर वह भगवान शिव के ऊपर आक्रमण करने का दुस्हास कर बैठा. राक्षस अंधकासुर के वध करने के लिए भगवान शिव के रूधिर से काल भैरव की उत्पत्ति हुई. कुछ पुराणों में बताया जाता है कि शिव के अपमान-स्वरुप काल-भैरव की उत्तपति हुई थी.

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भैरव का अर्थ होता है भय को हराने वाला . काल-भैरव भगवान की पूजा- अर्चना से हर तरह का संकट दूर होता है. काल-भैरव को भगवान शिव के गण के रूप में पूजे जाते हैं और काल-भैरव मां दुर्गा के अनुचारी के रूप में माने गए है. भैरव को चमेली का फूल बहुत पसंद है. इसलिए इनकी उपासना करते समय चमेली के पुष्प चढ़ाए जाते हैं. इनकी पूजा उपासना में चमेली के फूल का बड़ा महत्व है. मान्यता है कि काल-भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं.

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