नई दिल्ली. ईद उल अजहा 2019 के चांद का दीदार 2 अगस्त शुक्रवार को हो गया है. देशभर में बकरीद का त्योहार 10 दिन बाद यानी 12 अगस्त को मनाया जाएगा. इस्लाम में बकरीद को बरकतों का त्योहार कहा गया जिस दिन जानवर ( बकरा या भेड़) की कुर्बानी का खास महत्व है. बकरीद पर की जाने वाली कुर्बानी का अधिकतर गोश्त गरीबों में तकसीम किया जाता है. सुबह ईद की नमाज के बाद कुर्बानी की रस्म शुरू की जाती है.

क्यों हैं बकरीद पर कुर्बानी का रिवाज

बकरीद पर कुर्बानी से जुड़ी इस्लामिक जानकारी के अनुसार, इस्लाम धर्म के हजरत इब्राहिम अलैय सलाम के घर काफी मन्नतों के बाद संतान (बेटा) पैदा हुई जिसे हजरत अलैय सलाम दिल से चाहते थे. एक रात सोते वक्त हजरत इब्राहिम अलैय सलाम को ख्वाब आया जिसमें अल्लाह उनसे सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी मांगी. हजरत इब्राहिम को सबसे प्यारा उनका बेटा था लेकिन अपनी औलाद होने के बावजूद उन्होंने खुदा पर भरोसा करते हुए बेटे की कुर्बानी का मन बना लिया.

कुर्बानी के दौरान उन्हें दुख न हो इसलिए आंखों पर पट्टी बांध ली. जिसके बाद जैसे उन्होंने कुर्बानी की शुरुआत की अचानक एक दूंबा (भेड़) उनके बेटे की जगह आ गया जिस पर वह छुरी चली. जब हजरत ने आंखों से पट्टी खोली तो बेटे को सामने पाया. कहा जाता है कि उस दिन अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के सब्र की परीक्षा ली जिसके बाद से कुर्बानी का रिवाज शुरू हो गया.

कैसे की जाती है कुर्बानी
बकरदी के दिन नमाज अदा करने के बाद कुर्बानी की रस्म शुरू की जाती है. जिस जानवर की कुर्बानी दी जा रही है उसपर छुरी फेरने से पहले विशेष दुआ पढ़ी जाती है. अधिकतर जगहों पर मस्जिद के पेश इमाम या उनसे जुड़े धार्मिक लोग कुर्बानी करते हैं. कुर्बानी के बाद पूरे गोश्त को कई हिस्सों में बांटा जाता है जिसके बाद अधिकतर हिस्से गरीब लोग और रिश्तेदारों के नाम के निकाल लिया जाता है.

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