नई दिल्ली. महिषासुर पर मां दुर्गा की विजय प्राप्ति की खुशी में दुर्गा पूजा का पर्व मनाया जाता है. खास तौर पर देश के पश्चिम बंगाल, ओडिशा, त्रिपुरा, असम, मणिपुर, बिहार और झारखंड में इस पर्व की धूम देखने को मिलती है. इस बार दुर्गा पूजा 4 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक है. मां दुर्गा के इस पवित्र त्योहार को दुर्गोत्सव, अकालबोदन, शारदीय पूजो, महा पूजो, शारदीयोत्सव, मायर पूजो, दुर्गतनाशिनी, विजयदाशमी, शरदोत्सव के नाम से भी जाना जाता है.

क्यों मनाया जाता है दुर्गा उत्सव
हिंदू धर्म के अनुसार, दुर्गा पूजा मनाने के कई अलग कारण हैं. माना जाता है कि महाषासुर राक्षक दुर्गा मां ने वध किया था. वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार, कहा जाता है कि साल के इन्हीं नौ दिनों में देवी अपने मायके आती हैं. इन 9 दिनों को दुर्गा उत्सव के रूप में मनाया जाता है.

कैसे मनाया जाता है दुर्गा उत्सव का त्योहार
नवरात्रि से एक दिन पहले महालयासे दुर्गा पूजा की शुरूआत होती है. सबसे पहले महलाया अमावस्या की सुबह पितरों का तर्पण कर विदाई दी जाती है. कहा जाता है कि मां दुर्गा कैलाश पर्वत से महालया की शाम पृथ्वी लोक आती हैं और पूरे 9 दिनों तक धरती पर रहकर भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं. महालय के बाद पड़ने वाले सप्ताह को देबी पॉक्ष भी कहा जाता है.

पष्ठी के रोज तैयार किए गए सुंदर पंडालों में सरस्वती, मां दुर्गा, कार्तिक, लक्ष्मी, गणेश जी और महिषासुर की प्रतिमा की स्थापना की जाती है. इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की शुभ कामना के लिए व्रत भी करती हैं. सप्तमी पर तो देवी पंडाल में अलग ही नजारा देखने को मिलता है. भक्त मां को खिचड़ी. पापड़, बैंगन, सब्जियां आदि का भोग लगाते हैं. अष्टमी के दिन मां दुर्गा की अराधना की जाती है और कई तरह के पकवान उनपर चढ़ाए जाते हैं. नवमी की रात को मां दुर्गा की आखिरी रात मानी जाती है.

नवमी के बाद दसवें दिन दशहरा पड़ता है जिसकी सुबह सिंदूर खेल के बाद मां की प्रतिमा को विसर्जित किया जाता है. 9 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में मंच का आयोजन बनाया जाता है, जहां कई तरह के शानदार कार्यक्रम भी कराए जाते हैं.

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