नई दिल्ली. हिंदू नववर्ष की शुरुआत चैत्र मास से होगी. वहीं विक्रमी संवत का भी चैत्र अमावस्या आखिरी दिन माना जाता है. चैत्र माह के लगते ही अगले दिन से यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ हो जाएगा. चैत्र अमावस्या पर शुभ मुहूर्त के दौरान विधिवत पूजा का विधान है. इस बार चैत्र अमावस्या 24 मार्च की पड़ रही है. इसलिए आज हम आपको बता रहे हैं चैत्र अमावस्या का शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि.

चैत्र अमावस्या 2020 का शुभ मुहूर्त
सवार्थ सिद्धी योगी- सुबह 6 बजकर 20 मिनट से अगले दिन 4 बजकर 19 मिनट तक. अभिजित मुहूर्त- दोपहर 12 बजकर 3 मिनट से दोपहर 12 बजकर 52 मिनट तक.

चैत्र अमावस्या 2020 का महत्व
हिंदू धर्मके अनुसार, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली अमावस्या को चैत्र अमावस्या के नाम से जाना जाता है. चैत्र अमावस्या को विक्रमी संवत का अंतिम दिन भी कहा जाता है. इसके अगले ही दिन प्रतिप्रदा तिथि से चैत्र नवरात्रि शुरू हो जाती है. अमावस्या तिथि के दिन सूरज और चंद्रमा एक साथ होते हैं. इसी वजह से यह दिन पितरों के मोक्ष के लिए काफी जरूरी माना जाता है. इस दिन पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है.

चैत्र अमावस्या के दिन स्नान, दान और अन्य धार्मिक कार्यों का विधान है. चैत्र अमावस्या के दिन स्नान के बाद नदी में तिल प्रवाहित करें. जिसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर पितरों का तर्पण करें. चैत्र अमावस्या के दिन व्रत करने का भी विधान है. मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन व्रत करता है उसके जीवन की सभी इच्छाएं पूरी हो जाती है. इसलिए इस दिन प्रत्येक व्यक्ति तो व्रत जरूर करना चाहिए.

चैत्र अमावस्या की पूजा विधि
चैत्र अमावस्या के दिन पितरों का तर्पण सबसे ज्यादा श्रेष्ठ माना गया है. ऐसा करने से पितरों को मुक्ति मिलती है. चैत्र अमावस्या के दिन किसी पवित्र नदी या सरोवर में जरूर स्नान करें और तिल को नदी में बहा दें. जिसके बाद सफेद रंग के वस्त्र धारण करें. अगर हो सके तो किसी पंडित ने तर्पण कराएं या आप खुद भी तर्पण कर सकते हैं. जहां आपके पितरों का स्थान है या जहां उनकी तस्वीर लगी है, उस जगह को नीचे से अच्छी तरह साफ कर लें.

पितरों के स्थान पर देसी घी का दीप जलाए. जिसके बाद अपने पूर्वज की तस्वीर पर सफेद चंदन का तिलक करें और उन्हें सफेद रंग के फूल अर्पित करें. फिर प्रार्थना करें ‘हे पितृ देव हे मेरे पूर्वजों आज रात मैं जो भी प्रार्थना करूं, जो भी पूजा करूं वह सफल हो, मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान करें जिससे मेरे कार्यों को सफलता की प्राप्ति हो.’ इसके बाद पूर्वजों को खीर और पूरी का भोग लगाएं. फिर उन्हें नमन करें और क्षमा के लिए माफी मांगे.

अब किसी ब्राह्मण को भोजन जरूर कराएं और उन्हें वस्त्र और दक्षिणा दें. फिर पैर छूकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें. अंत में पितरों को भोग लगाई खीर और पूरी को किसी गाय को खिला दें और उसमें से कुछ हिस्सा प्रसाद के रूप में परिवार के साथ ग्रहण करें.

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