पटना. वैसे तो धर्म कोई भी, हर धर्म के पर्व-त्योहार का अपना एक अलग महत्व होता है. ठीक उसी तरह हिंदू धर्म में भी हर पर्व-त्योहार का अपना विशेष महत्व है. मगर बात जब उत्तर भारत विशेष रूप से बिहार, पूर्वांचल, झारखंड आदि की हो तो छठ पूजा को सबसे बड़ा व्रत माना जाता है. छठ व्रत सूर्य भगवान और छठी मईया की उपासना का पर्व है. इस पर्व का बिहार-यूपी के लोगों में कितना ज्यादा महत्व है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पर्व को महापर्व की  संज्ञा दी गई है. मुख्य रूप से बिहार की अस्मिता से जुड़ा छठ महापर्व आस्था का सबसे बड़ा उदाहरण है. हालांकि, अब इस पर्व ने बिहार-यूपी की सीमा को तोड़ दिया है. यही वजह है कि अब इस छठ पर्व को देश-विदेश में भी काफी धूमधाम से मनाया जाता है.
 
और लोगों के लिए भले ही दिवाली के बाद से त्योहारी सीजन समाप्त हो जाते होंगे, मगर उत्तर बिहार के लोगों का त्योहारी सीजन छठ पर्व के बाद ही खत्म होता है. कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की षष्टी को मनाए जाने वाला ये छठ व्रत लोगों की जिंदगी में खुशियों का प्रसार करता है. छठ व्रत बांस से बने सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्तनों, गन्ने, गुड़, चावल और गेहूं  से बने प्रसाद और कर्णप्रिय लोकगीतों  लोक जीवन में मिठास का प्रसार करता है.
 
वैसे जो लोग बिहार और उस जगह से आते हैं जहां छठ व्रत को मनाया जाता है, उन्हें इस पूजा के पीछे की कहानी के बारे में पता होता है. मगर बहुत से ऐसे लोग हैं जो छठ के बारे में काफी सुनते हैं, मगर इस व्रत को मनाने की वजह के बारे में नहीं जानते हैं. दरअसल, छठ पूजा की सबसे अच्छी और खास बात ये है कि छठ को सादगी, पवित्रता और लोकपक्ष का व्रत मानते हैं. छठ पूजा को लेकर कोई एक निश्चित कहानी नहीं है. क्योंकि ये एक लोक आस्था का पर्व है. यही वजह है कि छठ पूजा के पीछे कई कहानियां और मान्यताएं प्रचलित हैं. तो चलिए जानते हैं इस व्रत के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व को.
 
राजा प्रियंवद दंपति को संतान प्राप्ति
हिंदू धर्म में प्रचलिच एक पौराणिक कथा के अनुसार, राजा प्रियंवद सबकुछ से धनी थे, मगर उनका कोई संतान नहीं था. एक बार महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए राजा प्रियंवद को यज्ञ करने को कहा. महर्षि ने कहा था कि यज्ञ के पूर्णाहुति के लिए जो खीर बनेगी उसे अपनी पत्नी को खिलाने के लिए. राजा प्रियंवद ने ठीक उसी अनुसार सब कुछ किया और अपनी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी. हालांकि, ऐसा करने के बाद राजा प्रियंवद और मालिनी को पुत्र प्राप्ति का धन तो मिला, मगर  वो बच्चा मरा हुआ पैदा लिया. इसके बाद राजा प्रियंवद पुत्र के शव को लेकर श्मशान घाट गये और पुत्र वियोग में अपने प्राण त्यागने की ठान ली. राजा के द्वारा ऐसा करते देख सृष्टि की मूल प्रवित्रि के छठे अंश से उत्तपन्न हुईं भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुई हैं. उन्होंने राजा को प्राण त्यागने से रोका और पुत्र प्राप्ति के मार्ग बताये. देवसेना  कहा कि उनकी पूजा करने से ही संतान कू प्राप्ति होगी. इसके बाद राजा प्रियंवद और रानी मालिनी ने देवी षष्टी का व्रत किया और इस तरह से उन्हें पुत्र रतन की प्राप्ति हुई है. इसी के बाद से ऐसा माना जाता है कि छठ पूजा मनाई जाती है.
 
जब दानवीर कर्ण को मिला भगवान सूर्य से वरदान
हिंदू धर्म में ही एक मान्यता ये भी है कि छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में ही हुई है. ऐसा कहा जाता है कि सबसे पहले सूर्यपूत्र कर्ण ने माता को कलंक से मोक्ष दिलाने के लिए सूर्य भगवान की पूजा की थी. ये सर्व विदित है कि कर्ण सूर्य भगान के परम शिष्य थे. दानवीर कर्म घंटों कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्य भगवान को अर्ध्य दिया करते थे. यही वजह है कि आज भी लोग ये मानते हैं कि सूर्य की कृपा से ही कर्ण इतने महान योद्धा बने. तभी से छठ पूजा में पानी में खड़े होकर अर्ध्य देने की परंपरा शुरू हुई. छठ मनाने वालों में ऐसी मान्यता है कि छठ पूजा के दौरान पानी में खड़े होकर अर्ध्य देने से चर्म रोग ठीक हो जाते हैं.
 
जब माता सीता ने की भगवान सूर्य की पूजा
लोक कथाओं में ये भी बात सुनने को मिलती है कि माता सीता ने भी सूर्य देवता की पूजा की थी. ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री राम और माता सीता जब 14 वर्ष वनवास में बीता कर अयोध्या लौटे थे, तब माता सीता और भगवान राम ने राज्य की स्थापना के दिन यानी कार्तिक शुक्ल षष्टी को उपवास रखा था और उस दिन सूर्य भगवान की अराधना की थी. इतना ही नहीं, कहा तो ये भी जाता है कि माता सीता ने महर्षि मुद्गल के कुटिया में रहकर लगातार छह दिनों तक सूर्य भगवान की उपासना की थी.

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