नई दिल्ली. दिवाली के अगले दिन यानी कि कार्तिक शुक्ल पक्ष के दिन गोवर्दन पूजा होती है. गोवर्धन पूजा दिवाली त्योहार के चौथे दिन होती है. हिंदू धर्म के अनुसार, भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पूजा की थी और इंद्र देवता अहंकार तोड़ा था. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र की पूजा की बजाय गोवर्धन की पूजा शुरू करवाई थी. ऐसी मान्यता है कि इस दिन गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर उसकी पूजा की जाती है. इस साल ये पूजा दिवाली के अगले दिन यानी 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी. मगर अभी भी मन में ये सवाल है कि आखिर गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है? तो चलिए जानते हैं इस पूजा को मनाने के पीछे की असली वजह को. 
 
गोवर्धन पूजा का प्रचलन आज से नहीं, बल्कि भगवान कृष्ण के द्वापर युग से चला आ रहा है. द्वापर युग में पहले ब्रजवासी भगवान इंद्र की पूजा किया करते थे. मगर भगवान कृष्ण का तर्क था कि देवराज इंद्र गोकुलवासियों के पालनहाल नहीं हैं, बल्कि उनके पालनहार तो गोवर्धन पर्वत हैं. क्योंकि यहीं ग्वालों के गायों को चारा मिलता है, जिनसे लोग दूध प्राप्त करते थे. इसलिए भगवान कृष्ण ने गोकुल वासियों को कहा कि हमें देवराज इंद्र की नहीं, बल्कि गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि गोवर्धन पर्वत तो हमारे सामने है हमें इतना कुछ देते हैं लेकिन इंद्र को तो हमने देखा भी नहीं और अगर हम उनकी पूजा न करे तो वह नाराज हो जाते है ,तो वह हमारा पालन कैसे कर सकते है?
 
भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुलवासियों को तर्क दिया कि इंद्र से हमें कोई लाभ नहीं प्राप्त होता। वर्षा करना उनका कार्य है और वह सिर्फ अपना कार्य करते हैं जबकि गोवर्धन पर्वत गौ-धन का संवर्धन एवं संरक्षण करता है, जिससे पर्यावरण भी शुद्ध होता है। इसलिए इंद्र की नहीं बल्कि गोवर्धन पर्वत की पूजा की जानी चाहिए. इसके बाद गोकुलवासी देवराज इंद्र की बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे. इस बात से देवराज इंद्र काफी क्रोधित हो गये. इस अपमान का बदला लेने के लिए देवराज इंद्र ने गुस्से में आकर ब्रजवासियों को भारी वर्षा से डराने का प्रयास किया. लगातार सात दिन तक इंद्र वर्षा करते रहे. मगर श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ अंगुली पर उठाकर सभी गोकुलवासियों को इंद्र के कोप से बचा लिया. 
 
इस अचंभित दृश्य को देखकर इंद्र हैरान रह गये. बाद में इंद्र देव ब्रह्मा जी के पास गए और उन्होंने पूछा कि यह बालक कौन है ? तब ब्रहा जी ने बताया कि वह स्वयं भगवान विष्णु का रूप है. इसी के बाद गोवर्धन पर्वत की पूजा होने लगी थी. बता दें कि इस बारिश के दौरान पूरे सात दिनों तक पूरे ब्रजवासी गोवर्धन पर्वत की शरण में रहे थे. सच्चाई जानने के बाद देवराज इंद्र भगवान कृष्ण से क्षमा मांगने गये और अपने अहंकार पर दुख जताया. 
 
ऐसी मान्यता है कि गोवर्धन पूजा के दिन ही इंद्र भगवान का अहंकार टूटा था और इसी दिन वर्षा समाप्त हुई थी. तभी से दिवाली के कल होकर गोवर्धन पूजा का विधान बन गया. गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजा के नाम से भी जाना जाता है.
 
गोवर्धन पूजा का मुहूर्त
गोवर्धन पूजा का मुहूर्त प्रातःकाल मुहूर्त 6:37 से 8:55 मिनट तक और सायंकाल मुहूर्त 3:50 से 6:08 मिनट तक रहेगा. इसके बीच में गोवर्धन पूजा करने का सबसे अच्छा मौका रहेगा.
 

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