नई दिल्ली. हिन्दू धर्म में दिवाली या दीपावली भगवान राम की बनवास से अयोध्या वापसी की खुशी में मनाया जाता है जो लंका के राजा रावण के विजयादशमी यानी दशहरा के दिन के वध से ठीक 20 दिन बाद आता है. लेकिन भारत और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सिख, जैन और बौद्ध भी दिवाली का त्योहार मनाते हैं लेकिन उसकी वजह कुछ और है. सिख दिवाली को बंदी छोड़ दिवस के तौर पर मनाते हैं जबकि जैन इसे दिवाली बोलकर ही मनाते हैं. बौद्ध इसे तिहार नाम से मनाते हैं. तो इस खबर में हम आपको बताएंगे कि हिन्दुओं के अलावा सिख, जैन और बौद्ध दिवाली को क्यों, किस नाम से और किस तरह मनाते हैं.
 
सिख धर्म में दिवाली: सिखों के छठे गुरु गुरु हरगोविंद की जहांगीर की कैद से मुक्ति का पर्व
 
सिख अनुयायी दिवाली के ही दिन सिख धर्म के छठे गुरु गुरु हरगोविंद की मुगल बादशाह जहांगीर की कैद से रिहाई को बंदी छोड़ दिवस के नाम से मनाते हैं. 24 जून, 1606 को गुरु हरगोविंद को मात्र 11 साल की उम्र में सिखों का छठ गुरु चुना गया था. मुगल बादशाह जहांगीर ने महज 14 साल की उम्र में गुरु हरगोविंद को ग्वालियर की जेल में कैद कर लिया था. जहांगीर ने गुरु हरगोविंद को दिवाली के ही दिन जेल से छोड़ा था इसलिए सिख दिवाली के दिन हिन्दुओं की ही तरह अपने घर औऱ गुरुद्वारे को सजाते हैं, पटाखे जलाते हैं. इस दिन को सिख धर्म में अब औपचारिक तौर पर बंदी छोड़ दिवस के नाम से जाना जाता है. गुरु हरगोविंद की वापसी पर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को दीयों से सजा दिया गया था और तब से परंपरा वहां और पूरे सिख धर्म में चली आ रही है.
 
भगवान महावीर के निर्वाण दिवस को दिवाली के दिन मनाते हैं जैन धर्म वाले
 
जैन धर्म के आखिरी तीर्थांकर भगवान महावीर ने कार्तिक अमावस्या के दिन बिहार के पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था. कहा जाता है कि उनके निर्वाण के मौके पर कई देवी-देवता वहां मौजूद थे और प्रकाश फैलाकर अंधियारा दूर कर रहे थे. जैन धर्म को मानने वाले लोग इस दिन को दिवाली की पूजा करके निर्वाण लड्डू बांटते हैं. जैन लोग इस दिन घर में दीए और लैंप जलाते हैं औऱ लोगों के बीच मिठाइयां बांटते हैं. जैन लोग इस दिन अपनी बही-खाते की पूजा भी करते हैं. इसके अगले दिन जैन धर्म का नया साल शुरू हो जाता है.
 
सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने की याद में दिवाली मनाते हैं बौद्ध
 
बौद्ध धर्म के अंदर नेवार बौद्ध दिवाली के दिन अशोक विजयादशमी मनाते हैं जो सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने की याद का पर्व है. इस दिन बौद्ध मंदिर और मठ उसी तरह से सजाए जाते हैं जैसे हिन्दू अपने घर और मंदिर को सजाते हैं. नेपाल और दार्जिलिंग इलाके में नेवार बौद्ध ज्यादा पाए जाते हैं जो पांच दिन तक दिवाली का पर्व मनाते हैं. ये दिवाली को तिहार पर्व के नाम से मनाते हैं. पांच दिन के तिहार यानी दिवाली पर्व के पहले दिन कौए को भगवान का दूत मानकर प्रसाद चढ़ाया जाता है. दूसरे दिन ईमानदारी के लिए कुत्तों को भोजन दिया जाता है. तीसरे दिन गाय और बैल की पूजा होती है और इसी दिन लक्ष्मी की पूजा होती है. नेपाली कैलेंडर का ये आखिरी दिन होता है और इस दिन व्यापारी अपने बही-खाते साफ करते हैं. चौथे दिन नया साला मनाया जाता है और पांचवें दिन भाई टीका का पर्व होता है जिसे हिन्दू भाई दूज बोलते हैं.
 
 

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